औपनिवेशिक भारत में वन्दे मातरम् का विरोध, विभाजनकारी राजनीति के कारण किया गया था : डाॅ. लालजी प्रसाद निर्मल
लखनऊ, 23 अगस्त (हि.स.)। औपनिवेशिक भारत में वन्दे मातरम् का विरोध पूरी तरह विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा था। यह बात उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष एवं सदस्य विधान परिषद डाॅ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कही।
डॉ. निर्मल ने रविवार काे जारी बयान में कहा कि वन्दे मातरम् का प्रथम विरोध मुस्लिम लीग के अध्यक्ष रहे बैरिस्टर सैय्यद अली इमाम ने वर्ष 1909 में अमृतसर अधिवेशन में किया था। वे तुर्की के खलीफा और उस्मानी राज्य की रक्षा के लिए खिलाफत आन्दोलन चलाने वाले मुस्लिम लीग के 1908 में अध्यक्ष रहे। मो. अली जौहर जो वर्ष 1923 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, उन्होंने कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में वन्दे मातरम् का न केवल विरोध किया बल्कि अध्यक्ष रहते कांग्रेस अधिवेशन का बहिष्कार किया। यह वही जौहर थे, जिन्होंने भारत भूमि की जगह येरूशलम में दफन किए जाने की इच्छा जाहिर की थी और वे न तो भारत में मरे और न ही यहां की मिट्टी में दफन हुए।
वन्दे मातरम् का विरोध मो. अली जिन्ना ने 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग की बैठक में किया था। इसी कारण कांग्रेस को छोड़ भी दिया था। जिन्ना के विरोध के कारण ही वर्ष 1937 में कांग्रेस ने वन्दे मातरम् के पूर्ण गायन पर रोक लगा दी थी।
डाॅ. निर्मल ने कहा कि मो. अली जिन्ना और मो. अली जौहर दोनों ने लन्दन में हुए गोलमेज सम्मेलन में वर्ष 1930 में मुस्लिम के लिए अलग निर्वाचन और सुरक्षा की मांग की, जो बाद में भारत विभाजन का आधार बना। उन्हाेंने कहा कि वन्दे मातरम् का पूर्ण गायन देश के स्वाभिमान, अस्मिता और क्रान्तिकारियों के अमर बलिदान से जुड़ा हुआ है और उसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। अतः इसका विरोध कदापि उचित नहीं है।
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हिन्दुस्थान समाचार / मोहित वर्मा

