उप्र में मातृ स्वास्थ्य की मजबूत रीढ़ बना एफसीएम- एनीमिया के खिलाफ नई पहल, 10 हजार डोज लगाए गए
- एक इंजेक्शन, कम अस्पताल चक्कर और समय पर उपचार की दिशा से बना महिलाओं के बीच लोकप्रिय
- पांच जिलों से शुरू हुआ ट्रायल अब पूरे प्रदेश में लागू
लखनऊ, 29 सितंबर (हि.स.)। गर्भावस्था के दौरान एनीमिया यानी खून की कमी मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने मातृ एनीमिया के प्रबंधन में फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज (एफसीएम) को शामिल करते हुए उपचार व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक 10 हजार से ज्यादा डोज लगाए जा चुके हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक डॉ पिंकी जोवेल के मुताबिक एफसीएम की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं के उपचार में केवल आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां ही पर्याप्त नहीं होतीं। कुछ महिलाओं में दवा नियमित लेने में परेशानी, दुष्प्रभाव या गर्भावस्था के दौरान तेजी से हीमोग्लोबिन सुधार की जरूरत जैसी परिस्थितियां सामने आती हैं। वहीं आयरन सुक्रोज के लिए कई बार अस्पताल आने की जरूरत पड़ सकती है। एफसीएम अपेक्षाकृत बड़ी मात्रा में आयरन को एक ही सत्र में देने वाली उपचार पद्धति है, जिससे बार-बार स्वास्थ्य केंद्र आने की आवश्यकता कम हो सकती है।
उन्होंने बताया कि प्रदेश में एफसीएम की यात्रा को संस्थागत रूप देने की दिशा में आवश्यक दवाओं की सूची में इसे शामिल करने, खरीद की व्यवस्था, चिकित्सकों और स्टाफ नर्सों की क्षमता बढ़ाने तथा सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में इसे उपलब्ध कराने पर काम किया गया। इस पूरी प्रक्रिया को मातृ एनीमिया के स्क्रीन, रेफर, ट्रैक, ट्रीट मॉडल से भी जोड़ा गया है, ताकि महिला की पहचान से लेकर उपचार और फॉलोअप तक सेवाओं की निरंतरता बनी रहे।
इस पहल का महत्वपूर्ण पड़ाव फरवरी 2026 में रायबरेली से प्रशिक्षण की शुरुआत रहा। इसके बाद सीतापुर, हरदोई, रायबरेली, श्रावस्ती और बहराइच के फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) पर तैनात चिकित्सकों और स्टाफ नर्सों को एफसीएम के इस्तेमाल तथा एनीमिया प्रबंधन के मानकों पर प्रशिक्षित करने की योजना सामने आई। प्रशिक्षण में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) और गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज, कानपुर को तकनीकी साझेदार के रूप में जोड़ा गया। इस समय प्रदेश के सभी जनपदों में एफसीएम का प्रयोग हो रहा है।
इसके बाद एफसीएम सेवाओं के विकेंद्रीकरण की दिशा में भी कदम बढ़े। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सीतापुर में 28 अप्रैल 2026 को विकेंद्रीकृत एफसीएम सेवाओं की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य यह है कि मध्यम और गंभीर एनीमिया वाली गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं की पहचान समय रहते हो और उन्हें उपचार के लिए अनावश्यक रूप से दूर न जाना पड़े।
राष्ट्रीय स्तर पर भी वर्ष 2026 की एनीमिया मुक्त भारत संबंधी गाइडलाइन में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए अंतःशिरा आयरन उपचार को सुरक्षित एवं मानकीकृत तरीके से लागू करने पर जोर दिया गया है। राज्यों को चरणबद्ध तरीके से जिला अस्पताल और उससे ऊपर के संस्थानों से शुरुआत करने की सलाह दी गई है।
इस तरह उत्तर प्रदेश में एफसीएम की यात्रा केवल नई दवा को स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने की कहानी नहीं है, बल्कि समय पर पहचान, रेफरल, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, उपचार और फॉलोअप को एक साथ जोड़कर मातृ एनीमिया प्रबंधन को मजबूत करने की पहल है। आने वाले समय में इसकी प्रभावशीलता का आकलन उपचार कवरेज, हीमोग्लोबिन में सुधार, फॉलोअप और मातृ-नवजात स्वास्थ्य परिणामों जैसे संकेतकों के आधार पर किया जाना महत्वपूर्ण होगा।
छह से बढ़कर 12 ग्राम हुआ कुसुमा देवी का हीमोग्लोबिन
एफसीएम के लाभ का प्रत्यक्ष उदाहरण रायबरेली की कुसुमा देवी हैं। गर्भावस्था के आठवें महीने में हीमोग्लोबिन छह ग्राम प्रति डेसीलीटर पहुंचने के बाद रोहनिया क्षेत्र के छिपिया गांव की कुसुमा देवी (बदला हुआ नाम) को लगातार कमजोरी, थकान और हाथ-पैरों में झुनझुनी की शिकायत रहती थी। आयरन की गोलियां अनुकूल न लगने के कारण उनका नियमित सेवन भी नहीं कर पा रही थीं। ऐसे में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्सकों की सलाह से उन्हें एफसीएम इंजेक्शन लगाया गया। करीब एक माह बाद हुई जांच में उनका हीमोग्लोबिन बढ़कर 12 ग्राम प्रति डेसीलीटर हो गया। इसके बाद पांच सितंबर को उनका सामान्य प्रसव हुआ और उन्होंने 2.8 किलोग्राम वजन के स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
हिन्दुस्थान समाचार / शिव सिंह

