नवरात्र में महाभारत कालीन मन्दिर गुड़गांव में लगता 10 दिन मेला

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नवरात्र में महाभारत कालीन मन्दिर गुड़गांव में लगता 10 दिन मेला


फर्रुखाबाद, 18 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित महाभारत कालीन गुड़गांव देवी मंदिर नवरात्र में भक्तों के लिए पूजा अर्चना करने के लिए तैयार हो गया है। इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़े होने के कारण यहां प्रदेश के जिलों से ही नहीं बल्कि अन्य प्रदेशों आदि से भक्त आकर मनोती मांगते हैं।

पंडित प्रवेश शुक्ला बताते हैं कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान सर्वाधिक दिन फर्रुखाबाद में बिताए थे। जिसकी वजह यह थी कि उस समय जिले के कस्बा कम्पिल में पांचाल प्रदेश की राजधानी थी। जहां राजा द्रोपद राज किये करते थे। उनकी पुत्री द्रोपदी का स्वयंवर कम्पिल में ही हुआ था। कम्पिल से मछली की आंख भेद कर पांडव वधु ले गए थे। कम्पिल में रिश्तेदारी होने की वजह पांडव अज्ञातवास के दौरान फर्रुखाबाद में छिपे रहे। जिसे आज भी पांडा बाग के नाम से जाना जाता है। पांडवों के साथ उनके गुरु द्रोणाचार्य भी आए थे। गुरु द्रोण ने पांडवों की माता कुंती के लिए पूजा अर्चना करने के लिए फर्रुखाबाद के पश्चिम की ओर देवी मंदिर की स्थापना की थी। जिसे गुड़गांव देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है।

पंडित अशोक शास्त्री बताते हैं कि इस मंदिर की महिमा का बखान करना आसान नहीं है। यहां नवरात्र के समय 10 दिन तक मेला लगता है और इस मेले में एटा, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, हरदोई, बरेली तथा राजस्थान से लोग आकर देवी की मनौती मांगते हैं। मनौती पूरी होने पर वह फिर यहां आकर देवी के दर्शन कर 10 दिन तक यहां निवास करते हैं। महाभारत काल से इस मंदिर का इतिहास जुड़ा होने की वजह से यहां नवरात्र के समय रूट चेंज कर दिया जाता है। सभी वाहनों को बाईपास से निकाला जाता है। भारी भीड़ होने की वजह से यहां पुलिस तैनात रहता है। मंदिर के पास ही में एक स्थान है जहां पर भीम की गदा आज भी गड़ी हुई है। इस गधा के दर्शन करने से सभी मनोरथ पूरे होते हैं। इस वजह से जो लोग देवी के दर्शन करने आते हैं वह गदा के दर्शन करके अपने आप को आहो भाग्य महसूस करते हैं। इस बार गुरुवार से चैत्र नवरात्र के प्रारंभ होने के चलते यहां मेला लगने जा रहा है। जिसके लिए जिला प्रशासन ने व्यवस्थाएं पूरी कर ली है और मंदिर तक जाने के लिए आवागमन की सुविधा उपलब्ध करा दी गई है।

पंडित अशोक शास्त्री ने बताया कि मेले में आने वाले लोग आज भी बाग में ठहरते हैं। हालांकि मेला समिति के द्वारा उनके ठहरने के लिए धर्मशाला का निर्माण कर दिया गया है। इसके बाद भी भक्त प्रकृति की सजी सवरी छटाओं के बीच रहकर आत्मिक आनंद और मानसिक शांति की अनुभूति करते हैं। कहावत है कि -होके मायूस तेरे दर से सवाली न गया। झोलियाँ सबकी भरी कोई खाली न गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / Chandrapal Singh Sengar

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