धर्म के सामाजिक, नैतिक, दार्शनिक व आध्यात्मिक स्वरूप काे समझना जरूरी : प्रो. प्रशांत शुक्ला

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धर्म के सामाजिक, नैतिक, दार्शनिक व आध्यात्मिक स्वरूप काे समझना जरूरी : प्रो. प्रशांत शुक्ला


लखनऊ, 15 सितंबर (हि.स.)। लखनऊ विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग, जनसंख्या अनुसंधान केंद्र एवं विकास अध्ययन संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में कौटिल्य सभागार में एक विशेष व्याख्यान आस्था की भारतीय अवधारणा: बिना धर्मांतरण के सह-अस्तित्व (The Indian Idea of Faith: Co-existence without Conversion) आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दर्शनशास्त्र विभाग के प्रो. प्रशांत शुक्ला ने कहा कि मूल्य वह नहीं होते जो समाज में विद्यमान होते हैं, मूल्य वह होते हैं, जिन्हें हम प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धर्म को केवल किसी विशेष धार्मिक समुदाय या पूजा-पद्धति तक सीमित न मानकर उसके सामाजिक, नैतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक स्वरूप को समझना होगा।

आगे आपने भारतीय संस्कृति में निहित धार्मिक सहिष्णुता, बहुलतावाद और सर्वधर्म समभाव की परंपरा के साथ एकम सद विप्रा बहुधा वेदन्ती को विस्तारपूर्वक बात की। भारतीय होना केवल किसी धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र से संबंधित होना नहीं है। इसके मूल में भारत और उसके लोगों के प्रति अपनत्व की भावना होना आवश्यक है। भारत की विशेषता उसकी विविधता में एकता है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां, परंपराएं और जीवन-पद्धतियां होने के बावजूद एक साझा भारतीय पहचान विकसित हुई है।

भारतीय होने पर गर्व का अर्थ दूसरों को कमतर समझना नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति, दार्शनिक परंपरा, विविधता और सामूहिक विरासत के प्रति सम्मान और अपनत्व रखना है।इसलिए भारतीयता का आधार बहिष्कार नहीं, बल्कि अपनत्व और समावेशिता होना चाहिए। एक सच्चा भारतीय अपनी पहचान के साथ-साथ दूसरों की पहचान और विविधता का भी सम्मान करता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अर्थशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. रोली मिश्रा ने कहा कि धर्म हमें नैतिक आचरण की दिशा देता है और भारतीयता हमें विविधता के बीच साझा अपनत्व की भावना से जोड़ती है। हमारा प्रयास है कि विद्यार्थियों की छुपी हुई प्रतिभा क्षमता निखार कर उन्हें सुयोग्य नागरिक बनाने का। अतः ऐसे कार्यक्रम नियमित रूप से कराए जाते हैं।

विशिष्ट अतिथि वैल्यू एजुकेशन प्रोग्राम की नोडल अधिकारी एवं विज्ञान संकाय की अधिष्ठाता प्रो. शीला मिश्रा ने कहा कि भारत की धरती से उपजे किसी धर्म ने कन्वर्ज़न का प्रयास नहीं किया। मतांतरण के प्रयास नहीं होने चाहिए। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्हाेंने कहा कि धर्म केवल सिद्धांतों और कर्मकांडों का विषय नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार और जीवन में उतारना भी आवश्यक है। धर्म व्यक्ति के चरित्र और आचरण में दिखाई देना चाहिए।

आभार ज्ञापन अर्थशास्त्र विभाग के वरिष्ठ प्रो. अशोक कुमार कैथल ने किया। कार्यक्रम का संचालन सहायक आचार्य डॉ. हरनाम सिंह ने किया, जिसमें प्रमुख रूप से प्रो. अल्पना लाल, प्रो. शशि लता सिंह, प्रो. प्रीति सिंह, डॉ. कामना सेन गुप्ता, डॉ. शची राय, डॉ. उर्वशी सिरोही, डॉ. दिनेश यादव के साथ पापुलेशन रिसर्च सेंटर, इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज से जुड़े शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / मोहित वर्मा

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