चार सदी पुरानी है बड़ा मंगल मनाने की परंपरा, हवा में गूंजते हैं बजरंगबली के जयकारे

चार सदी पुरानी है बड़ा मंगल मनाने की परंपरा, हवा में गूंजते हैं बजरंगबली के जयकारे
चार सदी पुरानी है बड़ा मंगल मनाने की परंपरा, हवा में गूंजते हैं बजरंगबली के जयकारे


लखनऊ, 11 जून (हि.स.)। लखनऊ में ज्येष्ठ महीने में बड़ा मंगल का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। राजधानी में ज्येष्ठ माह के तीसरे मंगलवार पर चहुंओर बजरंगबली के जयकारे एवं भजनों से गूंजायमान है। जगह-जगह भंडारे का आयोजन किया गया है। मंदिरों में दर्शन पूजन के लिए सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी है,जिसके लिए शासन प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। आज तीसरा बड़ा मंगल है। बड़ा मंगल मनाने की परंपरा अवध के नवाब सआदत अली के कार्यकाल के दौरान हुई थी।

कोई भूख प्यासा नहीं रहता

लखनऊ में जेठ के सभी मंगल को कोई भूखा प्यासा नहीं रहता, शायद ही किसी के घर पर खाना बनता हो। बने भी क्यों, जब भंडारे में ही हर तरह का स्वाद मिल जाता है। जेठ की आग बरसती दुपहरी में भंडारों की तैयारी होती। कैसा भी रास्ता हो, संकरा या चौड़ा, हर चार कदम पर भंडारा लगता। सुबह घर से निकलने के बाद रात तक के खाने की चिंता नहीं करनी पड़ती। कोई वहीं खड़े होकर खाता, कोई गाड़ी में बैठकर तो कई लोग भंडारे का प्रसाद पैक कराकर घर ही ले जाते। कहने को तो प्रसाद, लेकिन पेट जब तक न भरे, खाते ही जाते। बड़े मंगल के दिन शहरभर में दो हजार से ज्यादा स्थानों पर भंडारे, पियाऊ और प्रसाद वितरण का आयोजन विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों द्वारा किया जाता है।

उल्लेखनीय है कि वैशाख के बाद हिंदू नववर्ष का तीसरा महीना ज्येष्ठ मास शुरू होता है। इस माह में मंगलवार का दिन बजरंगबली को समर्पित है। लेकिन ज्येष्ठ के महीने में आने वाला हर मंगलवार हनुमान जी की पूजा के लिए पुण्यकारी बताया गया है।

बड़ा मंगल का इतिहास

लखनऊ में बड़ा मंगल की परंपरा करीब 400 वर्ष पहले की है। अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर की स्थापना नवाब शुजाउद्दौला की बेगम और दिल्ली की मुगलिया खानदान की बेटी आलिया बेगम ने करवाई थी। 1792 से 1802 के बीच मंदिर का निर्माण हुआ था। कथानक है कि बेगम के सपने में बजरंगबली आए थे। बजरंगबली ने सपने में एक टीले में प्रतिमा होने का हवाला दिया था। बड़ी बेगम ने टीले को खोदवाया और बजरंगबली की प्रतिमा को हाथी पर रखकर मंगाया। गोमती पार प्रतिमा स्थापित करने की मंशा के विपरीत हाथी अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर से आगे नहीं बढ़ सका। उत्सव के साथ मंदिर की स्थापना की गई।

मंदिर के गुंबद पर चांद का निशान एकता और भाईचारे की मिसाल पेश करता है। स्थापना काल के दो तीनवर्षों के बाद फैली महामारी को दूर करने के लिए बेगम ने बजरंगबली का गुणगान किया तो महामारी समाप्त हो गई। इस दौरान उत्सव का आयोजन किया गया। आयोजन का दिन मंगलवार था और ज्येष्ठ मास का महीना था। बस फिर उसी समय से शुरू हुआ बड़ा मंगल लगातार जारी है। जगह-जगह भंडारे में हिंदू मुस्लिम दोनों ही शामिल होते हैं।

अलीगंज हनुमान मंदिर से हुई शुरूआत

बड़े मंगल की परंपरा अलीगंज के हनुमान मंदिर से ही शुरू हुई। चंद्रमास जेठ के पहले मंगल का मेला यहां की प्रधान परंपरा है। बड़े मंगल पर यहां मेला लगता आया है। अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह ने बड़ा मंगल की इस परंपरा को उत्साहपूर्वक निभाया और आगे बढ़ाया।

बड़े मंगल पर अलीगंज हनुमान मंदिरों की परिक्रमा करने के लिए दूरदराज से लोग आते हैं।

मनोरथ प्राप्ति के लिए भक्त लेटकर ही घर से मंदिर तक ही यात्रा तय करते हैं। पहले बड़े मंगल की परंपरा अलीगंज हनुमान मंदिरों से ही जुड़ी थी। धीरे-धीरे बड़े मंगल की प्रतिष्ठा लखनऊ भर के अन्य हनुमान मंदिरों तक भी पहुंचने लगी।

एक अन्य कथानक के अनुसार इत्र कारोबारी लाला जाटमल ने अलीगंज में हनुमान मंदिरों को बनवाया। अलीगंज हनुमान मंदिर का विग्रह स्वयंभू है और यह मूर्ति महंत खासाराम को एक स्वप्न निर्देश में जमीन से मिली। महंत खासाराम के अनुरोध पर ही इस मंदिर का निर्माण करवाया गया।

हिन्दुस्थान समाचार/डॉ.आशीष वशिष्ठ/राजेश

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