लोस चुनाव : महर्षि वामदेव की तपोभूमि बांदा से किसे मिलेगा जीत का आशीर्वाद

लोस चुनाव : महर्षि वामदेव की तपोभूमि बांदा से किसे मिलेगा जीत का आशीर्वाद
लोस चुनाव : महर्षि वामदेव की तपोभूमि बांदा से किसे मिलेगा जीत का आशीर्वाद


लखनऊ, 15 मई (हि.स.)। केन और यमुना नदी के बीच बसे बांदा को महर्षि वामदेव की तपोभूमि कहा जाता है। इस शहर का नाम महर्षि वामदेव के नाम पर ही रखा गया है। बांदा संसदीय क्षेत्र पश्चिमी यूपी में केन और यमुना नदी के बीच स्थित है। यह शहर केन नदी के किनारे स्थित है। इस क्षेत्र की पहचान पूर्व विदेश मंत्री विदेश मंत्री और कालाकांकर प्रतापगढ़ रियासत के राजा दिनेश सिंह के नाम पर भी होती है। पिछले एक दशक से इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। उप्र की संसदीय सीट संख्या 48 बांदा में पांचवें चरण के तहत 20 मई को मतदान होगा।

बांदा संसदीय सीट का इतिहास

यह सीट कभी भी किसी पार्टी का गढ़ नहीं बन पायी। 1952 के पहले आम चुनाव में यह सीट बांदा जिला-फतेहपुर जिला सीट थी। उस समय इस सीट से दो सांसद चुने जाते थे। इस चुनाव में कांग्रेस यहां से जीती। 1957 में इस सीट पर एक सांसद का निर्वाचन शुरू हुआ। 1957 के चुनाव में कांग्रेस के राजा दिनेश सिंह ने यहां से सांसद बनें। 1962 में दोबारा कांग्रेस ने रिजल्ट दोहराया। हालांकि, 1967 में पहली बार क्षेत्र के लोगों ने अपना मूड बदला। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के जागेश्वर यादव चुनाव जीते। इसके बाद चुनाव दर चुनाव इस सीट पर विजेता को बदलने की परंपरा बन गई। हालांकि, पिछले दो चुनावों से बांदा ने भाजपा पर भरोसा जताया है। अभी यहां से भाजपा के आर0के0 सिंह पटेल यहां से सांसद हैं। भाजपा यहां जीत की हैट्रिक लगाने की तैयारी में है। अब तक इस चुनाव में 17 लोकसभा चुनाव में 5 बार कांग्रेस, 4 बार भाजपा, 2-2 बार सीपीआई, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) जीते चुके हैं। 1977 में यहां भारतीय लोकदल ने जीत का परचम फहराय था।

पिछले दो चुनावों का हाल

17वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी आर0के0 सिंह पटेल ने सपा के श्याम चरण गुप्त का परास्त किया था। आर0के0 सिंह पटेल को 477,926 (46.18%) वोट मिले। वहीं सपा प्रत्याशी को 418,988 वोट हासिल हुए। जीत का अंतर करीब 59 हजार वोट का था। कांग्रेस और सीपीआई के प्रत्याशी तीसरे और चौथे स्थान पर रहे, दोनों की जमानत जब्त हुई।

2014 के चुनाव की बात करें तो भाजपा के भैरों प्रसाद मिश्रा ने ये चुनाव 1 लाख 13, 788 वोटों के अंतर से जीता था। मिश्रा का मुकाबला बसपा के आर0के0 सिंह पटेल से था। भाजपा प्रत्याशी को 342,066 (39.84%) वोट मिले। बसपा के खाते में 226,278 (26.35%) वोट आए। सपा के बाल कुमार पटेल और कांग्रेस के विवेक कुमार सिंह तीसरे और चौथे स्थान पर रहे। कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई।

किस पार्टी ने किसको बनाया उम्मीदवार

भाजपा ने मौजूदा सांसद आर0के0 सिंह पटेल को मैदान में उतारा है। सपा से कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल और बसपा से मयंक द्विवेदी चुनावी समर में उतरे हैं।

बांदा सीट का जातीय समीकरण

इस लोकसभा क्षेत्र में साढ़े 18 लाख से अधिक मतदाता है। जाति समीकरण की बात करें तो बांदा चित्रकूट लोकसभा क्षेत्र में ढाई लाख से ज्यादा ब्राह्मण मतदाता हैं। इसी के आसपास कुर्मी यानी पटेल मतदाता हैं। जो हमेशा जीत-हार की दिशा तय करता है। बाकी जातियां और मुस्लिम वोटर भी ठीकठाक संख्या में हैं।

विधानसभा सीटों का हाल

बांदा लोकसभा सीट में पांच विधानसभा सीटें बबेरू, नरैनी, बांदा, चित्रकूट और मानिकपुर आती हैं। चित्रकूट और मानिकपुर सीटें चित्रकूट जिले में हैं। अन्य विधानसभा क्षेत्र बांदा जिले में हैं। बबेरू पर सपा और मानिकपुर सीट पर अपना दल सोनलाल का कब्ज है। बाकी तीन सीटों पर भाजपा काबिज है।

जीत का गणित और चुनौतियां

इतिहास के आईने के परिदृश्य पर नजर डालें तो यहां अधिकतर कुर्मी और ब्राह्मण प्रत्याशियों का दबदबा रहा है। बांदा सीट पर अब तक 7 बार ब्राह्मण उम्मीदवार तो 5 बार कुर्मी उम्मीदवार को जीत मिल चुकी है। इस बार सपा कांग्रेस और भाजपा ने कुर्मी बिरादरी के प्रत्याशी पर दांव लगाया है। वहीं बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेला है जिससे भाजपा की चिंता बढ़ गई है। बसपा युवा प्रत्याशी मयंक द्विवेदी के चुनाव मैदान में आ जाने से भाजपा में भितरघात का खतरा मंडरा रहा है। पिछली बार ब्राह्मणों की उपेक्षा से ब्राह्मण वर्ग भाजपा से नाराज था। लेकिन मोदी लहर में जातिवाद से ऊपर उठकर लोगों ने भाजपा प्रत्याशी को भरपूर समर्थन दिया था। भाजपा ने इस बार भी किसी ब्राह्मण को महत्व नहीं दिया। इस वजह पूर्व सांसद भैरोप्रसाद मिश्रा और उनके समर्थकों में नाराजगी हे। बसपा प्रत्याशी मयंक द्विवेदी भाजपा के मतदाताओं पर सेंधमारी करने में जुट गए हैं। वहीं भाजपा के असंतुष्ट नेताओं से संपर्क बढ़ाया जा रहा है।

पत्रकार दिनेश निगम का मानना है कि, ब्राह्मणों में थोड़ी नाराजगी है, लेकिन लंबे अरसे से ब्राह्मण भाजपा का परंपरागत वोट बैंक बन गया है। डबल इंजन की सरकार के कार्यों और राम मंदिर की गूंज क्षेत्र में साफ तौर पर सुनाई देती है। वैसे भी वोट मोदी के नाम से पड़ना है। निगम के मुताबिक, यहां लड़ाई त्रिकोणीय है, और जीत हार का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं होगा।

बांदा से कौन कब बना सांसद

1952 शिव दयाल/प्यारे लाल (कांग्रेस)

1957 दिनेश सिंह (कांग्रेस)

1962 सवित्री निगम (कांग्रेस)

1967 जागेश्वर यादव (भाकपा)

1971 राम रतन शर्मा (भारतीय जनसंघ)

1977 अंबिका प्रसाद पांडे (जनता पार्टी)

1980 रामनाथ दुबे (कांग्रेस)

1984 भीष्म देव दुबे (कांग्रेस)

1989 राम सजीवन (भाकपा)

1991 प्रकाश नारायण त्रिपाठी (भाजपा)

1996 राम सजीवन सिंह (बसपा)

1998 रमेश चंद्र द्विवेदी (भाजपा)

1999 राम सजीवन सिंह (बसपा)

2004 श्याम चरण गुप्ता (सपा)

2009 आर0के0 सिंह पटेल (सपा)

2014 भैरो प्रसाद मिश्र (भाजपा)

2019 आर0के0 सिंह पटेल (भाजपा))

हिन्दुस्थान समाचार/ डॉ. आशीष वशिष्ठ/मोहित

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