भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास

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भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


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भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


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भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


भगवान की कथा में जीवों का कल्याण करने का सामर्थ्य : स्वामी राजेंद्रदास


गोरखपुर, 28 सितंबर (हि.स.)। युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन, वृंदावन से पधारे कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी श्री राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज ने कहा कि जिसे भगवान की कथा का व्यसन लग गया, वह जीते जी ही मुक्त हो जाता है। संसार में बद्ध संसारी मुमुक्षु तथा सिद्ध मुक्त ये तीन प्रकार के जीव होते हैं। भगवान की कथा में ऐसा सामर्थ्य है कि यह तीनों प्रकार के जीवों का कल्याण कर सकती है।

कथा श्रवण में गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी सम्मिलित हुए। उन्होंने कथा श्रवण करने से पूर्व व्यास पीठ का पूजन किया और आज की कथा विश्राम के बाद श्रीमद्भागवत महापुराण की आरती उतारी।

कथा के प्रारंभ में स्वामी राजेंद्रदास जी ने गीतावली का पाठ करके रामचरित का वर्णन किया और कहा कि श्री रामचरित की कथा के अंत में रामराज्याभिषेक ही किया जाता है क्योंकि उत्तर काण्ड में भगवान का प्रयाण होता है। भक्त भगवान को सदा राजा के रूप में ही देखना चाहता है। उन्होंने सालासर बालाजी के प्राकट्य की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि हनुमान जी भक्त मोहन दास जी के अधीन होकर उनके कार्य करने आ जाते हैं। व्यक्ति को प्रभाव के साथ स्वभाव भी अच्छा रखने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि प्रभाव की सुन्दरता स्वभाव के सुंदरता पर ही आधारित होती है। स्वभाव की सुंदरता पर जो प्रेम होता है वह निस्वार्थ प्रेम होता है। प्रेम के मूल में प्रभाव, स्वभाव, सौंदर्य और अपनापन ये चारों गुण होते हैं। यही चारों गुण ही भगवान में एक साथ विद्यमान होते हैं। हमारे अपने भगवान ही हैं बाकी यह दुनिया तो पराई है, हमेशा साथ रहने वाली नहीं है। उन्होंने पूतना वध का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान को कोई चाहे जिस भाव से अपनाये भगवान उसकी कल्याण करते ही हैं। मारने आई पूतना को भी भगवान माता वाले गति प्रदान करते हैं।

उन्होंने कहा कि भाव रोग के प्रभाव से हम मूर्छा में रहते है, इसलिए अपने बंधे होने का पता नहीं चलता। भगवान की कथा भाव रोग के प्रभाव को धीरे धीरे कम करके हमें मुमुक्षु बना देती है। कथा का रस मीठे शरबत की तरह है जो स्वाद में मीठी तथा रोग का हरण करने वाली है।

जो जहां है वो वही से कथा का आश्रय ले ले, कल्याण सुनिश्चित है। जिनकी आशा और तृष्णा समाप्त हो गयी है तथा जो आप्तकाम हो गये है, एसे मुक्तात्मा, जीव नित्य भगवान की लीला का दर्शन करते रहते है। आत्मकल्याण करने वाली भगवान की कथा में जिसका मन न लगे वो आत्महत्यारा कहा गया है। संसार का सबसे बड़ा पाप आत्महत्या है, ऐसे जीव जो आत्महत्या करते हैं, हजार वर्षों तक प्रेत में रहना पड़ता है। इसलिए कथा सुनने बड़ा कोई पुण्य नहीं है और कथा न सुनने बड़ा कोई पाप नहीं है। प्रत्येक गृहस्थ के घर में दिन में कम से कम एक घंटे का सत्संग परिवार जन के साथ होना चाहिए। इससे उनके जीवन में आने वाली सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है, साथ ही उस घर के बच्चे भी संस्कारी हो जाते हैं।

स्वामी जी ने कहा कि कथा के श्रोता को बिना इच्छा के भी चार लाभ मिल मिल जाता है। पहला लाभ है अप्तकाम अर्थात तृणा रहित हो जाना, कामनाओं के रहते कामनाएं कभी पूरी नहीं होती बल्कि कामनाओं को समाप्ति से ही कामनाएं पूरी होती हैं और यह कथा से ही संभव है। दूसरा लाभ अंतःकरण की शुद्धि है, जप यज्ञ, पूजा , स्नान, सब अंत करण की शुद्धि के लिए ही होते है किंतु भगवान का प्रेम पाने के लिए जैसी शुद्धि चाहिए वह कथा से ही संभव है। कथा सुनने का तीसरा लाभ भगवान की भक्ति की प्राप्ति है। भगवान से प्रेम करना हो तो निरंतर उनके नाम का जप करो तथा उनको याद करो उनसे प्रेम होने लगेगा। जैसी कमी व्यक्ति को स्त्री तथा लोभी को धन प्यारा होता है उसी तरह भक्त को भगवान प्यारे लगने लगते है। कथा का चौथा लाभ है संत साधु लोगों से दोस्ती होना।

स्वामी जी ने कहा कि जिसको संत, ब्राह्मण और गाय को देखकर प्रसन्नता न हो उसके हृदय में भगवान का वास नहीं होता। साधु संत बाहर से साधु हो सकते है किंतु साधु उनके अन्दर हो यह जरूरी नहीं है, किंतु गाय बाहर से साधु न दिखने पर भी गाय न साधु के सारे लक्षण उनके अंदर होते है। जिसको गाय प्यारी लगती है उसको भगवान प्यारे लगने लगते है। कथा व्यास ने कहा कि गाय जिसे स्वीकार नहीं करती उसे भगवान भी त्याग देते हैं। इसलिए लक्ष्मी जी गाय के अंदर अपना निवास चाहती हैं, गाय ने उनको अपने गोबर में स्थान दिया इस प्रकार गाय के गोबर में लक्ष्मी जी का नित्य निवास होता है, इसलिए हमारे मांगलिक अनुष्ठानों में गाय के गोबर का प्रयोग किया जाता है।

आज की में स्वामी विद्याचैतन्य जी महाराज, अयोध्या से आए महंत धर्मदास जी महाराज, महंत लालनाथ जी महाराज, विधायक प्रदीप शुक्ल व विपिन सिंह, पुष्पदंत जैन, संजय सिंह, अजय सिंह, जितेंद्र बहादुर चंद, महेश पोद्दार, विकास जालान प्रमुख से सम्मलित हुए। कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण से हुआ। संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

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