श्री काशी विश्वनाथ धाम में प्रकृति के संरक्षण का संदेश, कपड़े के झोले वितरित

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श्री काशी विश्वनाथ धाम में प्रकृति के संरक्षण का संदेश, कपड़े के झोले वितरित


—ब्रह्मांड के सबसे बड़े पर्यावरणविद भगवान शिव, जटाओं में बहती गंगा जल संरक्षण का प्रतीक

वाराणसी,15 जुलाई (हि.स.)। श्री काशी विश्वनाथ धाम के गंगा द्वार पर बुधवार को सिंगल यूज़ प्लास्टिक का उपयोग न करने का निवेदन कर श्रद्धालुओं में कपड़े का झोला वितरित कर प्रकृति के संरक्षण का संदेश दिया गया। गंगा सेवक राजेश शुक्ल ने कपड़े का झोला वितरित करने के बाद श्रद्धालुओं को भगवान शिव के प्रकृति प्रेम को भी बताया।

उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े पर्यावरणविद भगवान शिव का पूरा स्वरूप ही प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा संदेश है। उनका हर प्रतीक जैसे जटाओं में बहती गंगा जल संरक्षण का, गले में नाग जैव विविधता का और कैलाश पर्वत पारिस्थितिक संतुलन का प्रतीक है। भगवान शिव यह सिखाते हैं कि प्रकृति के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। भगवान शिव के जीवन और प्रतीकों में प्रकृति का संदेश गहराई से छिपा है । शिव अपनी जटाओं में गंगा को धारण करते हैं, जो हमें जल को स्वच्छ और अविरल रखने, तथा जीवनदायिनी नदियों को प्रदूषित न करने की सीख देती है। गले में सर्प का वास यह बताता है कि पृथ्वी के हर छोटे-बड़े जीव (जैसे सांप), जो हमारी खाद्य श्रृंखला का हिस्सा हैं, उनका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। भगवान शिव का निवास हिमालय और कैलाश पर्वत है, जो जलवायु को नियंत्रित करने और पृथ्वी के स्तंभ के रूप में पर्यावरण को संतुलित करने का कार्य करते है । शिव का वाहन नंदी केवल एक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और पशुओं के प्रति दया का मूल आधार है। महादेव का अर्धनारीश्वर रूप प्रकृति और पुरुष का संतुलन यह बताता है कि जिस प्रकार शिव (पुरुष/चेतना) के बिना प्रकृति अधूरी है, उसी प्रकार प्रकृति (शक्ति) के बिना शिव की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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