धार्मिक-आध्यात्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ का मनाया गया प्राकट्य शताब्दी दिवस

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धार्मिक-आध्यात्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ का मनाया गया प्राकट्य शताब्दी दिवस


धार्मिक-आध्यात्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ का मनाया गया प्राकट्य शताब्दी दिवस


धार्मिक-आध्यात्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ का मनाया गया प्राकट्य शताब्दी दिवस


गोरखपुर, 09 अगस्त (हि.स.)। सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और भक्ति के प्रचार-प्रसार में एक शताब्दी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही विश्वप्रसिद्ध धार्मिक-आध्यात्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ के प्रकाशन के 100 वर्ष पूरे होने पर रविवार को गीता वाटिका में श्रद्धा और भक्तिभाव के बीच ‘कल्याण’ प्राकट्य शताब्दी दिवस मनाया गया। गीता वाटिका स्थित नित्यलीलालीन गृहस्थ संत परम श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार के पावन कक्ष में आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने ‘कल्याण’ की गौरवपूर्ण शताब्दी यात्रा को नमन किया।

प्रातः सात बजे प्रारंभ हुए कार्यक्रम में ‘कल्याण’ के प्रथमांक से चयनित अनेक पदों का भावपूर्ण गायन किया गया। इसके बाद भगवन्नाम संकीर्तन हुआ तथा श्रीभाईजी और ‘कल्याण’ ग्रंथ का विधिवत पूजन-अर्चन किया गया। संकीर्तन और भक्ति गीतों से गीता वाटिका का वातावरण देर तक भक्तिमय बना रहा। बड़ी संख्या में भगवत्प्रेमी श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम में सहभागिता की।

बंबई से शुरू हुई थी ‘कल्याण’ की यात्रा

‘कल्याण’ का प्रथम अंक श्रावण कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत 1983 में प्रकाशित हुआ था। इसका मुद्रण बंबई स्थित वेंकटेश्वर प्रेस में हुआ था। दूसरे वर्ष के दूसरे अंक से इसका मुद्रण गीताप्रेस, गोरखपुर में होने लगा। देखते ही देखते ‘कल्याण’ भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, संस्कृति और सदाचार के प्रामाणिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।

आज सौ वर्ष की यात्रा पूरी कर चुकी ‘कल्याण’ देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सनातन संस्कृति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रचार-प्रसार में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। इसके विभिन्न विशेषांकों और नियमित अंकों ने पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति, धर्मग्रंथों, संत परंपरा और भक्ति के गहन स्वरूप से परिचित कराने का कार्य किया है।

मानवमात्र के कल्याण को बनाया मूल उद्देश्य

‘कल्याण’ के आदि संपादक परम श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार ने प्रथम अंक में ‘कल्याण की आवश्यकता’ शीर्षक संपादकीय के माध्यम से पत्रिका के उद्देश्य को स्पष्ट किया था। उन्होंने मानवमात्र के परम कल्याण को ‘कल्याण’ की मूल प्रेरणा बताते हुए परमात्मा की प्राप्ति को जीवन का परम पुरुषार्थ माना था। उनका संदेश था कि परम कल्याण के मार्ग पर चलने का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को समान रूप से प्राप्त है।

शताब्दी दिवस पर भाईजी के इसी लोकमंगलकारी चिंतन का स्मरण करते हुए वक्ताओं ने कहा कि ‘कल्याण’ की सौ वर्ष की यात्रा केवल एक पत्रिका की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय सनातन जीवन-मूल्यों, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने का एक सतत अभियान है।

भक्ति और लोकमंगल का संदेश आगे बढ़ाने का संकल्प

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि एक शताब्दी से ‘कल्याण’ ने धर्म, अध्यात्म, सदाचार, भक्ति और भारतीय संस्कृति की अमूल्य परंपरा को सरल एवं प्रामाणिक साहित्य के माध्यम से समाज तक पहुंचाया है। बदलते समय और संचार के नए माध्यमों के बावजूद ‘कल्याण’ का मूल उद्देश्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

शताब्दी समारोह के दौरान गीता वाटिका भगवन्नाम संकीर्तन और भक्ति के स्वर से गुंजायमान रही। श्रद्धालुओं ने ‘कल्याण’ की शताब्दी को भारतीय आध्यात्मिक पत्रकारिता की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए इसके लोकमंगलकारी संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

इस अवसर पर हनुमान प्रसाद पोद्दार स्मारक समिति के पदाधिकारी, गीता वाटिका से जुड़े कार्यकर्ता, संत-महात्मा तथा बड़ी संख्या में भगवत्प्रेमी श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

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