जालियांवाला बाग बरसी पर उठा चंबल के क्रांतिवीरों को न्याय देने का मुद्दा, स्मारक निर्माण की मांग

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जालियांवाला बाग बरसी पर उठा चंबल के क्रांतिवीरों को न्याय देने का मुद्दा, स्मारक निर्माण की मांग


औरैया, 13 अप्रैल (हि.स.)। जालियांवाला बाग नरसंहार की बरसी पर सोमवार को औरैया जिले में चंबल संग्रहालय पंचनद परिवार ने चंबल अंचल के क्रांतिवीरों को न्याय दिलाने और उनकी स्मृतियों को संरक्षित करने की मांग को लेकर जोरदार आवाज उठाई। कचहरी परिसर में श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में सभा आयोजित की गई, जिसके पश्चात जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री और राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन सौंपा गया।

सभा के दौरान “क्रांति नायकों को न्याय दो”, “स्मृतियों को जीवंत करो” और “जीता चमार, मारून सिंह लोधी, जंगली-मंगली भंगी का स्मारक बनाओ” जैसे नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। सभा पदाधिकारियों ने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी चंबल घाटी के हजारों क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाओं को उचित स्थान नहीं मिला है।

शहीद वंशज देवेंद्र सिंह चौहान एडवोकेट ने अपने संबोधन में कहा कि आजाद भारत की सरकारों ने चंबल के क्रांतिकारियों के इतिहास की अनदेखी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि इटावा जनपद से कई बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद इस क्षेत्र के क्रांतिवीरों के सम्मान और इतिहास के संरक्षण की दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं हुआ।

चंबल परिवार प्रमुख डॉ. शाह आलम राणा ने सैफई स्थित उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय का नाम क्रांतिकारी जंगली-मंगली भंगी के नाम पर रखने की मांग की। उन्होंने कहा कि जिन क्रांतिवीरों ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया, उन्हें डकैत बताकर बदनाम किया गया, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अब समय है कि इन गुमनाम नायकों को उनका उचित सम्मान मिले, उनके नाम पर स्मारक बनाए जाएं और उनकी गाथाओं को शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

ज्ञापन में 1857 की क्रांति के अग्रणी योद्धा जीता चमार के योगदान का विस्तार से उल्लेख किया गया। पंचनद घाटी के बंसरी गांव निवासी जीता चमार ने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ते हुए चंबल अंचल में क्रांति की मशाल जलाई। उनके नेतृत्व में शेरगढ़, नीमरी, कालपी, चकरनगर सहित कई क्षेत्रों में अंग्रेजों को कड़ी चुनौती मिली। उन्होंने आत्मसमर्पण के सभी प्रस्तावों को ठुकराते हुए अंतिम सांस तक संघर्ष किया।

इसी तरह पाली धार गांव के क्रांतिकारी मारून सिंह लोधी का भी स्मरण किया गया, जिनके नाम से अंग्रेजी हुकूमत और ग्वालियर रियासत तक भयभीत रहती थी। ब्रिटिश अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने उन्हें “नॉर्थ वेस्टर्न प्रॉविंस का सबसे खतरनाक व्यक्ति” बताया था। 1860 में उन्हें फांसी दी गई, लेकिन उनकी वीरता आज भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

सभा में वक्ताओं ने कहा कि चंबल घाटी हमेशा से अन्याय के खिलाफ खड़ी रही है और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में यह क्षेत्र क्रांति का प्रमुख केंद्र रहा। चकरनगर और भरेह रियासत की ओर से स्वतंत्र राज्य की घोषणा इसका प्रमाण है।

आयोजन समिति के विनोद सिंह गौतम ने जानकारी दी कि 14 अप्रैल 2026 को भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर सुबह 10 बजे बुद्धा पार्क, नुमाइश ग्राउंड, इटावा में “क्रांतिकारी जीता चमार स्मरण सभा” का आयोजन किया जाएगा।

इस दौरान वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि चंबल की धरती वीर प्रसूता रही है और यहां के क्रांतिकारियों की गाथाओं को संरक्षित करना पूरे समाज और सरकार की जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और बलिदान पर गर्व कर सकें।

कार्यक्रम में श्याम सिंह तोमर, अनीस अहमद, रामबरन, सूरजरेखा त्रिपाठी एडवोकेट, मानसिंह चमार, संतोष पांडे, अमर सिंह तोमर, घनश्याम, चंद्रवीर चौहान, अंकित चतुर्वेदी एडवोकेट, महेश कुमार, राहुल तोमर, अंकित पिप्पल, शीलेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट, रंजीत यादव, सत्यवीर, राधा कृष्ण, चंद्रोदय सिंह, दीप कुमार सहित अनेक लोगों उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील कुमार

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