झांसी पुलिस ने दरोगा भर्ती से जुड़ी निलंबन की खबर बताई भ्रामक

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30 दिन से अधिक अनुपस्थित 23 कर्मियों पर हुई कार्रवाई

झांसी, 24 मार्च (हि.स.)। झांसी जिले में सोशल मीडिया पर पुलिस से संबंधित एक समाचार खूब प्रसारित हो रहा है। जिसमें बताया गया कि दरोगा भर्ती परीक्षा में शामिल होने या तैयारी के लिए अनुपस्थित रहने वाले 23 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है। इस खबर का झांसी पुलिस ने खंडन किया है। पुलिस ने इसे पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन बताया है। साथ ही झांसी पुलिस मीडिया सेल पर स्पष्टीकरण भी जारी किया है।

स्पष्टीकरण में बताया गया है कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर विभिन्न थाना एवं शाखाओं के अभिलेखों की जांच में यह सामने आया कि कुल 23 पुलिसकर्मी बिना किसी पूर्व सूचना के 30 दिनों से अधिक समय तक अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहे। पुलिस नियमावली के तहत यह कृत्य दंडनीय पाया गया,जिसके चलते संबंधित कर्मियों को नियमानुसार निलंबित किया गया है और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई जारी है।

जिला पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इन निलंबनों का दरोगा भर्ती परीक्षा से कोई संबंध नहीं है। यह कार्रवाई केवल लंबी अवधि तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहने के आधार पर की गई है। झांसी पुलिस ने आमजन और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं से अपील की है कि किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की पुष्टि अवश्य करें, ताकि अफवाहों और भ्रामक खबरों के प्रसार को रोका जा सके।

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर यह खबर प्रकाशित की गई थी कि दरोगा की परीक्षा देने गए 23 सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया था। यह भी बताया गया था कि उन्होंने इसकी सही जानकारी नहीं दी थी।

चर्चाओं में सिपाहियों का निलंबन

पुलिस में अनुशासन आवश्यक है। लेकिन निलंबन के बाद निलंबित सिपाहियों और विभाग के जानकारों के मन में तमाम सवाल भी उथल पुथल मचाए हैं। विभागीय जानकारों की मानें तो यह प्राविधान है कि यदि कोई छुट्टी पर घर गया और उसकी तबीयत बिगड़ जाती है तो उसे चिकित्सा का पूरा विवरण प्रस्तुत करना पड़ता है। जोकि सिपाहियों द्वारा किया भी गया होगा। लेकिन बावजूद इसके उनको निलंबित कर दिया गया। यही नहीं सरकारी चिकित्सक का ही मेडिकल मान्य होता है। जो अपने आप में चिकित्सक का दायित्व तय करता है। ऐसे तमाम साक्ष्य के बावजूद उक्त निलंबन चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल ये भी हैं कि क्या साक्ष्यों का दंभ भरने वाला विभाग स्वयं साक्ष्यों को नहीं मानता या फिर साक्ष्य मनगढ़ंत हैं। इसके अलावा कई सिपाहियों की शादियां भी तय होने वाली थी उन पर भी संशय मंडराने लगा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / महेश पटैरिया

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