खौफनाक रहा पश्चिम बंगाल का अनुभव, 28 में 27 सीटों पर खिला कमल : अनुपमा लोधी

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खौफनाक रहा पश्चिम बंगाल का अनुभव, 28 में 27 सीटों पर खिला कमल : अनुपमा लोधी


खौफनाक रहा पश्चिम बंगाल का अनुभव, 28 में 27 सीटों पर खिला कमल : अनुपमा लोधी


पश्चिम बंगाल चुनाव की कहानी, महिला आयोग सदस्या की जुबानी

झांसी, 06 मई (हि.स.)। हाल ही में पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने तीन राज्यों में प्रचंड जीत दर्ज की। इन चुनावों में पश्चिम बंगाल की जीत को खास तौर पर वहां के लोगों के लिए “डर से मुक्ति” के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, आज भी कई लोगों के मन में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रभाव और भय की छाया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

उप्र की महिला आयोग सदस्य अनुपमा लोधी, जिन्होंने पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी संभाग के पांच जिलों की 28 विधानसभा सीटों पर करीब दो महीने तक प्रचार-प्रसार किया, ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि यह जीत केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव की भी प्रतीक है। उनके अनुसार, भाजपा ने इन 28 सीटों में से 27 पर जीत हासिल की, जबकि एक सीट पर महज लगभग 2000 मतों से हार का सामना करना पड़ा।

उन्होंने अपने दो महीने के अनुभव को “खौफनाक” बताते हुए कहा कि शुरुआत में वहां संगठन लगभग न के बराबर था। कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा किया और लोगों को जागरूक किया। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती वहां का भय का माहौल था। लोग खुलकर बोलने से डरते थे, केवल सुनते थे, प्रतिक्रिया देने से कतराते थे। यह डर कथित रूप से टीएमसी समर्थित असामाजिक तत्वों का था, जो कभी भी हिंसा कर सकते थे। सीआरपीएफ जवानों ने गांवों तक पहुंचकर लोगों को सुरक्षा का अहसास भी दिलाया।

उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्हें किसी भी घर में बैठकर चाय तक नहीं मिली, क्योंकि लोग डर के कारण खुलकर समर्थन जताने से हिचकते थे। “मां, माटी और मानुष” के नारे पर बनी टीएमसी सरकार पर उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में इन मूल्यों का वास्तविक अर्थ ही बदल गया।

उन्होंने यह भी बताया कि चुनाव से ठीक पहले उन्हें अपनी बेटी की विदाई जैसे महत्वपूर्ण पारिवारिक क्षण को छोड़कर पार्टी के निर्देश पर पश्चिम बंगाल जाना पड़ा। लेकिन वहां उन्हें हजारों परिवारों का दर्द बांटने का मौका मिला। जब वे लोगों से संगठन में जुड़ने की बात करतीं, तो जवाब मिलता—“वोट देंगे, लेकिन जुड़ेंगे नहीं, वरना जान का खतरा है।”

इसके बावजूद, उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास था कि बदलाव संभव है। स्थानीय लोगों ने भी इस विश्वास को बनाए रखा और अंततः परिणाम उसी के अनुरूप आया। जब वे कुछ दिनों के लिए झांसी लौटने की बात करती थीं, तो स्थानीय लोग निराश हो जाते थे, मानो उनका सहारा छिन रहा हो।

अंत में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल का यह अनुभव सिखाता है कि “डर के आगे ही जीत होती है।”

हिन्दुस्थान समाचार / महेश पटैरिया

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