गुरुओं की तपोभूमि को संवार रही सरकार, पर्यटन विकास परियोजनाओं से निखर रहे संत रविदास और देवरहा बाबा के तीर्थ

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गुरुओं की तपोभूमि को संवार रही सरकार, पर्यटन विकास परियोजनाओं से निखर रहे संत रविदास और देवरहा बाबा के तीर्थ


लखनऊ, 28 जुलाई (हि.स.)। गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और ज्ञान परंपरा के सम्मान का पर्व है। उत्तर प्रदेश, जहां ऋषि-मुनियों, संतों और आचार्यों की समृद्ध गुरु परंपरा सदियों से समाज का मार्गदर्शन करती रही है, आज उसी विरासत को नए आयाम मिल रहे हैं। प्रदेश सरकार आध्यात्मिक पर्यटन विकास के माध्यम से गुरु परंपरा से जुड़े मंदिरों, आश्रमों, गुरुद्वारों और संतों की तपोस्थलियों का संरक्षण एवं विकास कर रही है। इससे न केवल सांस्कृतिक विरासत सशक्त हो रही है, बल्कि नई पीढ़ी भी अपनी गौरवशाली ज्ञान परंपरा से जुड़ रही है।

सनातन परंपरा में यह पर्व महर्षि वेदव्यास की स्मृति में 'व्यास पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। बौद्ध परंपरा में यह भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश और धर्मचक्र प्रवर्तन का स्मृति-दिवस है। जैन परंपरा में इसका संबंध गौतम स्वामी के ज्ञान-दीक्षा प्रसंग से है। सिख परंपरा में भी गुरु-वाणी सर्वोपरि है। इसीलिए गुरु पूर्णिमा गुरु-शिष्य परंपरा एवं आध्यात्मिक चेतना का सार्वकालिक उत्सव है। प्रभु श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ से ज्ञान-संस्कार प्राप्त कर आदर्श जीवन की मर्यादाओं को आत्मसात किया। वहीं, भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर ज्ञान प्राप्त किया।

गुरुओं की भूमि 'उत्तर प्रदेश'भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान स्थान दिया गया है। उत्तर प्रदेश को ऋषियों और संतों की भूमि कहा जाता है। महर्षि वाल्मीकि, वेदव्यास, महर्षि भारद्वाज, ऋषि पराशर, महर्षि याज्ञवल्क्य, संत कबीर, रविदास, गोस्वामी तुलसीदास और गुरु गोरक्षनाथ जैसी विभूतियों ने यहीं से भारतीय संस्कृति को दिशा दी। प्रदेश के तीर्थ, आश्रम और धाम आज भी इस गौरवशाली परंपरा के साक्षी हैं। इसी विरासत को संरक्षित करने के लिए प्रदेश सरकार ने वर्ष 2019-20 से 2025-26 के बीच कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं में आकार लिया, तो कुछ मूर्त रूप ले रही हैं।

गुरु गोरखनाथ, संत रविदास से देवराहा बाबा तक विकास की श्रृंखलाप्रदेश सरकार द्वारा महोबा के गोरखगिरि पर्वत पर नाथ संप्रदाय के प्रमुख आस्था केंद्र में 11.25 करोड़ रुपए की लागत से 51 फीट ऊंची गुरु गोरखनाथ की कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है। अमेठी के जायस में गुरु गोरखनाथ की 25 फीट ऊंची योग मुद्रा वाली कांस्य प्रतिमा का निर्माण लगभग 5.95 करोड़ रुपए की लागत से कराया जा रहा है। वाराणसी स्थित संत रविदास की जन्मस्थली सीर गोवर्धन धाम के पुनर्विकास और विस्तार पर 51.54 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। वहीं, देवरिया में ब्रह्मऋषि देवरहा बाबा आश्रम के पर्यटन विकास पर 2.50 करोड़ रुपए की परियोजना भी प्रगति पर है।

ऋषि आश्रमों के संरक्षण पर विशेष जोर इसी क्रम में प्रदेश के विभिन्न जनपदों में स्थित ऋषि आश्रमों, तपोस्थलों, गुरुद्वारों और संतों से जुड़े पवित्र स्थलों के पर्यटन विकास एवं सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपए की परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इनमें फर्रुखाबाद स्थित ऋंगी ऋषि की तपोभूमि ऋंगी रामपुर के लिए 84.39 लाख रुपए, मैनपुरी के मयन ऋषि आश्रम के लिए 16.52 लाख रुपए, जेवर स्थित ज्वाला ऋषि मंदिर के लिए 56.27 लाख रुपए, सहारनपुर के मुंडी खेड़ी स्थित गुरु प्रहलाद दास जी तपोस्थली, शिव मंदिर एवं तालाब के विकास के लिए 118.89 लाख रुपए तथा गोरखपुर के उदासीन ऋषि आश्रम के सौंदर्यीकरण एवं पर्यटन विकास के लिए 142.23 लाख रुपए स्वीकृत किए गए हैं। इसके अलावा, वाराणसी स्थित संत गुरु रविदास जी की जन्मस्थली सीर गोवर्धन में पार्क विकास के लिए 259.76 लाख रुपए, बांदा स्थित ऋषि वेदव्यास की जन्मस्थली के लिए 127.08 लाख रुपए तथा आजमगढ़ के दुर्वासा ऋषि आश्रम के पर्यटन विकास हेतु 99.21 लाख रुपए की धनराशि खर्च होने हैं। मुजफ्फरनगर के शुकतीर्थ स्थित रविदास मंदिर के पर्यटन विकास के लिए 229.57 लाख रुपए की धनराशि स्वीकृत की गई है।

नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ने का प्रयास'उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि 'गुरु पूर्णिमा आस्था के साथ गुरु परंपरा, ज्ञान और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पावन अवसर है। उनके अनुसार प्रदेश सरकार संतों, ऋषियों और गुरुओं से जुड़े स्थलों के संरक्षण के साथ आधुनिक पर्यटन सुविधाओं का विस्तार कर रही है, ताकि नई पीढ़ी अपनी आध्यात्मिक विरासत से जुड़ सके।

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हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन

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