फर्रुखाबाद :श्रद्धा से मनाया गया गुरु पूर्णिमा पर्व,ओशो शिष्यों ने गहन ध्यान कर गुरु को किया याद

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फर्रुखाबाद :श्रद्धा से मनाया गया गुरु पूर्णिमा पर्व,ओशो शिष्यों ने गहन ध्यान कर गुरु को किया याद


फर्रुखाबाद,29 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद में गुरु पूर्णिमा का पर्व धूमधाम से मनाया गया। ओशो रजनीश के शिष्यों ने गहन ध्यान में डूब कर अपने सद्गुरु को याद किया।

इस मौके पर ओशो शिष्य स्वामी आनन्द पुनीत ने कहा कि गुरु पूर्णिमा गुरु जैसा है। शिष्य आषाढ़ के काले बादलों जैसा है। शरद पूर्णिमा का चांद सुंदर होता है, क्योंकि आकाश खाली होता है। वहां शिष्य है ही नहीं, गुरु अकेला है। आषाढ़ में सुंदर हो, तभी कुछ बात है, जहां गुरु बादलों जैसा शिष्यों से घिरा हो।

शिष्य सब तरह के जन्मों—जन्मों के अंधेरे लेकर आ गए। वे अंधेरे बादल हैं, आषाढ़ का मौसम है। उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी रोशनी पैदा कर सके, वो ही गुरु है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा में गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी इशारा है। स्वभावत: दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है।

उन्होंने कहा कि ध्यान रखना, अगर तुम्हें यह समझ में आ जाए काव्य—प्रतीक, तो तुम आषाढ़ की तरह हो, अंधेरे बादल हो। न मालूम कितनी कामनाओं और वासनाओं का जल तुममें भरा है और न मालूम कितने जन्मों—जन्मों के संस्कार लेकर तुम चल रहे हो, तुम बोझिल हो। तुम्हें तोड़ना है, तुम्हें चीरना है। तुम्हारे अंधेरे से घिरे हृदय में रोशनी पहुंचानी है। इसलिए पूर्णिमा, चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा मौजूं होता, तथ्यगत होता। क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। इसे थोड़ा समझना।

चांद की सब रोशनी उधार है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। चांद पर तो सूरज की रोशनी का प्रतिफलन होता है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। वह दीए की रोशनी का प्रतिफलन है, वापस लौटती रोशनी है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है।

इसी तरह ओशो अपने शिष्यों के लिए दर्पण है। ओशो की महिमा अनन्त है, उसे गाया नहीं जा सकता। इस मौके पर स्वामी प्रेम उल्लास,स्वामी अनिल, सहित दर्जनों सन्यासी मौजूद रहे।

श्री महाकाल मंदिर अंगूरी बाग में आषाढ़ शुक्ल पक्ष गुरु पूर्णिमा का पर्व धूमधाम से मनाया गया। यह पर्व महर्षि वेद व्यास जी को समर्पित है। इस दिन गंगा स्नान, दान और व्रत के लिए है। इस साल शुभ सहयोग से प्रीति योग, आयुष्मान योग और बुधादित्य राजयोग जैसे बेहद शुभ संयोग बन रहे हैं।

मंदिर की महंत अर्चना दीक्षित ने गुरु की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु ही हमारे जीवन में अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान हैं। गुरु के बिना ज्ञान, संस्कार और चरित्र का निर्माण संभव नहीं है। आज के समय में जब समाज संस्कार विहीन हो रहा है, तब गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखना अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके दिखाए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। मंदिर में गुरुवर का पूजन नूतन वस्त्र पंच फल, पंच मिठान, पूड़ी, सब्जी, रायता का भोग लगाकर किया गया। इसके पश्चात आरती पूजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में उपस्थित भक्तों ने गुरु का आशीर्वाद लिया और प्रसाद ग्रहण किया।

इस अवसर पर आलोक दीक्षित, हरि ओम गहलोत, गाजियाबाद से लता कटियार, गोलू, शिखा, शिवांगी, श्वेता, दिल्ली से पूनम, अरविंद, मथुरा से सोनू आलोक, अवधेश बाजपेई, विजय, चंदन, राजेश बालकृष्ण, लालाराम, रामबाबू चौरसिया तथा निर्मला बाजपेई, सरोज शिखा, शिवांश, रुद्रांश आदि भक्त मौजूद रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / Chandrapal Singh Sengar

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