सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण से अर्थव्यवस्था व रोजगार को बल मिला : जयवीर सिंह

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सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण से अर्थव्यवस्था व रोजगार को बल मिला : जयवीर सिंह


--सत्य के अनुसंधान व निरंतर विचार यात्रा का नाम भारत है

लखनऊ, 20 जनवरी (हि.स.)। विश्व हिन्दू परिषद के आयाम विश्व हिन्दू अकादमिक संगठन की ओर से मंगलवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में हिन्दुत्व की शाश्वत प्रासंगिकता विषय पर आयोजित दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का उदघाटन प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने किया। इस अवसर पर उन्हाेंने काशी, अयोध्या और मथुरा के सांस्कृतिक पुनरुद्धार का उदाहरण देते हुए कहा कि “सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण से न केवल आस्था, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी बल मिला है।”

महात्मा गांधी वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति संजीव शर्मा ने कहा कि अपनी वैचारिक श्रेष्ठता के कारण भारत विश्व गुरू था। हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता व संस्कृति का नाम भारत है। विश्व का सबसे पहला ग्रन्थ ऋग्वेद भारत में लिखा गया। सबसे पहली कविता महर्षि वाल्मीकि ने लिखी। उन्होंने कहा ऋग्वेद के काल तक आने में भी बहुत समय लगा होगा। भारतीय हिन्दू परम्परा में बहुत प्रयोग के बाद निर्णय लिया गया होगा—एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति। हमारी संस्कृति विश्व का संरक्षण व चिंता करने वाली है। वसुधैव कुटुम्बकम हमारे व्यवहार व आचरण में है।

संजीव शर्मा ने कहा कि भारत ने सदा ऋषि परम्परा का सम्मान किया। हमारे ऋषियों ने सत्य का अनुसंधान निरंतर किया। निरंतर विचार यात्रा का नाम भारत है। उसका ​पर्यायवाची हिन्दू है। हमारी परम्परा शास्तार्थ से भरी है। महिलाओं को भी वेदाध्ययन व शास्तार्थ का अधिकार था। हिन्दुत्व का विचार परम्परा से मिला है। इसका आदि व अंत नहीं है, इसीलिए सनातन है।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय सिंह ने दिव्यांग पुनर्वास को हिन्दुत्व की करुणा और मानवीय गरिमा की परम्परा से जोड़ा।

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर. के. मित्तल ने सामाजिक समरसता और संवैधानिक मूल्यों के साथ भारतीय संस्कृति के सहअस्तित्व को रेखांकित किया।

विश्व हिन्दू अकादमिक संगठन के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. नचिकेता तिवारी ने कहा कि विभिन्न कालखंडों में इस्लाम का प्रभाव कहीं सांस्कृतिक समन्वय के रूप में तो कहीं कठोर धार्मिक दृष्टिकोण के कारण सामाजिक चुनौतियों के रूप में सामने आया। उन्होंने कहा कि भारत जैसी बहुलतावादी संस्कृति में संवाद, सह-अस्तित्व और विवेक आधारित दृष्टि ही सामाजिक संतुलन बनाए रख सकती है तथा हिन्दुत्व की समावेशी सोच इसी भावना को सशक्त करती है।

हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन

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