रंगमंच केवल मेरा पेशा नहीं, मेरी सांसों में बसा एक संस्कार है : सुषमा शर्मा

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रंगमंच केवल मेरा पेशा नहीं, मेरी सांसों में बसा एक संस्कार है : सुषमा शर्मा


प्रयागराज, 03 अप्रैल (हि.स)। रंगमंच केवल मेरा पेशा नहीं, बल्कि मेरी सांसों में बसा एक संस्कार है। जब हम रंगमंच के माध्यम से नई पीढ़ी और बच्चों को जोड़ते हैं, तो हम केवल एक कला नहीं सिखाते, बल्कि एक संवेदनशील और बेहतर समाज की मजबूत नींव रखते हैं। यह बातें शुक्रवार को अभिनेत्री एवं निर्देशिका सुषमा शर्मा ने उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित विमर्श कार्यक्रम में कही।

कार्यक्रम का शुभारम्भ शुक्रवार को मुख्य वक्ता सुषमा शर्मा, केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा एवं डॉ. मुकेश उपाध्याय (उपनिदेशक कार्यक्रम) ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। प्रख्यात रंगकर्मी सुषमा शर्मा किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अभिनय की बारीकियों से लेकर नाटकों के सशक्त निर्देशन तक, उनका सफर रंगमंच के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की कहानी है। इसी अथक साधना और नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित ‘उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवार्ड’ के लिए चयनित किया गया है।

सुषमा शर्मा ने बताया कि अब तक लगभग 35 नाटकों में उन्होंने अभिनय का जादू बिखेरा है, जबकि 54 नाटकों का सफल निर्देशन किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, दिल्ली, उड़ीसा, कोलकाता, राजस्थान और गुजरात जैसे कई राज्यों में राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोहों में अपने नाटकों का मंचन किया है। एकल नाटकों (सोलो प्ले) में उनकी विशेष महारत है। धूप का एक टुकड़ा, कृष्णा, चोला मोर माटी और एक थी सारा जैसे एकल नाटकों में काम किया है।

उन्होंने कहा कि जहां एक ओर आज के दौर में संस्कृत रंगमंच सिकुड़ रहा है, वहीं उन्होंने नागानंदम, मालविकाग्निमित्रम्, अष्टम सर्ग, माधवी, प्रतिमा नाटक, उत्तर प्रश्न और मृच्छकटिकम् जैसे क्लिष्ट संस्कृत नाटकों का निर्देशन कर इस प्राचीन परम्परा को नई जीवंतता प्रदान की है।

बाल रंगमंच और ‘समन्वय रंग मंडल’ का सफर वर्ष 1996 में स्थापना और 1997 में भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ के रंग मंडल में कार्य करने के बाद, उन्होंने अपनी कला को नए आयाम दिए। 2012 से उनकी संस्था ‘समन्वय रंग मंडल’ के रूप में पूर्णतः सक्रिय है। उन्होंने बाल नाट्य कार्यशालाओं के जरिए नई पीढ़ी में नाट्य संस्कार बोने का भागीरथ प्रयास किया है। बाल नाटकों पर आधारित उनकी पुस्तक ‘खिला फूल गुलाब का’ (जिसमें 7 नाटक शामिल हैं) प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा ‘कला वसुधा’ पत्रिका में उनके नाटक ‘कौवा कान ले गया, ‘दुर्गा भाभी, शबरी की प्रतीक्षा’ आदि निरंतर प्रकाशित हुए हैं।

रेडियो, दूरदर्शन और शोध में भी अग्रणी आकाशवाणी पर पिछले तीन दशकों से सक्रिय सुषमा ने ‘युव वाणी, नन्ही दुनिया, बाल संघ और गृह लक्ष्मी’ जैसे कार्यक्रमों के लिए नाटक, फीचर और आलेख लिखे हैं। दूरदर्शन पर प्रसारित टेली फिल्म ‘जानकीबाई उर्फ छप्पनछुरी, अलख आजादी की और अजीब दास्तां है यह’ में उन्होंने अपने शानदार अभिनय का लोहा मनवाया। संस्कृति विभाग, नई दिल्ली की फेलोशिप (2005-2007) के अंतर्गत उन्होंने अवध की लोकनाट्य परम्पराओं का स्वरूपगत अध्ययन पर गहन शोध किया। साथ ही एनसीजेडसीसी के लिए मधुबनी कलाकार यशोदा देवी पर लिखी पुस्तक का हिंदी अनुवाद भी किया। इस अवसर पर केंद्र के समस्त अधिकारी, कर्मचारी एवं गणमान्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन आकाश अग्रवाल ने किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र

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