कच्छ चर्म शिल्प के शिल्पाचार्य अंचल पी. बिजलानी को सीएसजेएमयू ने दी डी.लिट् की मानद उपाधि

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कच्छ चर्म शिल्प के शिल्पाचार्य अंचल पी. बिजलानी को सीएसजेएमयू ने दी डी.लिट् की मानद उपाधि


कानपुर, 09 जुलाई (हि.स.)। पारंपरिक हस्तशिल्प केवल कला नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव है। शिक्षा और तकनीक के माध्यम से पारंपरिक हुनर को नई पहचान देकर आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को आगे बढ़ाया जा सकता है। यह बातें गुरुवार को डी.लिट्. की मानद उपाधि प्राप्त करने के बाद अंचल पी. बिजलानी ने कहीं।

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के 41वें दीक्षांत समारोह में कच्छ की पारंपरिक चर्म शिल्प कला के शिल्पाचार्य और उद्यमी अंचल पी. बिजलानी को कुलाधिपति एवं उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने डॉक्टर ऑफ लेटर्स (डी.लिट्.) की मानद उपाधि प्रदान की। उन्हें कच्छ की पारंपरिक चर्म शिल्प कला के संरक्षण और संवर्धन में योगदान के लिए यह उपाधि दी गई।

14 मार्च 1978 को जन्मे अंचल पी. बिजलानी पिछले 35 वर्षों से कच्छ की पारंपरिक चर्म शिल्प कला के संरक्षण, संवर्धन और नवाचार के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। विभाजन के बाद उनके पूर्वज पाकिस्तान से भारत आए और कच्छ के सुमरासर गांव को अपनी कर्मभूमि बनाया। परिवार की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भारतीय चर्म शिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

वर्ष 2019 में गुजरात सरकार ने उन्हें कच्छ चर्म शिल्प, सूक्ष्म कटिंग, हस्त-उत्कीर्णन (हैंड टूलिंग) और नवाचार के लिए राज्य शिल्प पुरस्कार से सम्मानित किया था। उनके द्वारा तैयार किए गए बैग, पर्स, कमर बेल्ट, जूते और अन्य चर्म उत्पाद कच्छ की पारंपरिक शिल्प कला का हिस्सा हैं।

उपाधि ग्रहण करने के बाद अंचल पी. बिजलानी ने कहा कि यह सम्मान उनके साथ-साथ उनके पूर्वजों की उस विरासत का भी है, जिसने विभाजन के बाद भी भारतीय लोकशिल्प की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक हस्तशिल्प को केवल सजावटी वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से 'लोकल फॉर वोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प को आगे बढ़ाने की अपील की। उन्होंने कहा कि शिक्षा और तकनीक का उपयोग पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार से जोड़ने में किया जाना चाहिए।

अंचल पी. बिजलानी ने बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी शारदा बेन के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में चर्म शिल्प प्रशिक्षण की व्यवस्था विकसित की है। इसके माध्यम से 50 से 60 महिलाओं और युवाओं को प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार से जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि कला का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक बदलाव पहुंचाना होना चाहिए।

उन्होंने अपने संबोधन के अंत में विश्वविद्यालय प्रशासन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि एक पारंपरिक शिल्पकार को डी.लिट्. की मानद उपाधि दिया जाना इस बात का संकेत है कि आज देश में शैक्षणिक ज्ञान के साथ पारंपरिक कौशल और लोककलाओं को भी महत्व दिया जा रहा है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

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