राष्ट्रीय सहारा व राष्ट्रीय सहारा समय के पत्रकार-कर्मचारियों ने उप श्रमायुक्त के समक्ष रखीं अपनी वर्षों पुरानी समस्याएं
गोरखपुर, 08 जनवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय सहारा एवं सहारा समय टी वी चैनल से जुड़े पत्रकारों और कर्मचारियों ने गुरुवार को श्रमायुक्त कार्यालय (डीएलसी) पहुंचकर उप श्रमायुक्त शक्ति सेन मौर्य के समक्ष अपनी वर्षों पुरानी समस्याएं रखीं। इस अवसर पर लोकल प्रबंधन, पत्रकारों/कर्मचारियों तथा श्रम विभाग के अधिकारियों के बीच शांतिपूर्ण और विस्तृत वार्ता हुई। वार्ता का मुख्य केंद्र लंबे समय से लंबित वेतन भुगतान, ग्रेच्युटी, सेवा शर्तों की स्पष्टता और संस्थान के भविष्य से जुड़ी स्थिति रही।
वार्ता के दौरान पत्रकारों और कर्मचारियों ने उप श्रमायुक्त को अवगत कराया कि बुधवार को लोकल प्रबंधन द्वारा मौखिक रूप से यह जानकारी दी गई कि राष्ट्रीय सहारा आर्थिक कठिनाइयों के दौर से गुजर रहा है, जिसके चलते आगे अखबार का मुद्रण कार्य नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही कर्मचारियों से यह भी कहा गया कि वे तीन माह का वेतन तथा एक माह के नोटिस पीरियड की राशि लेकर इस्तीफा सौंप दें। कर्मचारियों ने स्पष्ट किया कि यह पूरी सूचना मौखिक थी, किसी प्रकार का लिखित आदेश या आधिकारिक पत्र उन्हें प्राप्त नहीं हुआ।
पत्रकारों और कर्मचारियों ने बताया कि वे पिछले 30 से 35 वर्षों से राष्ट्रीय सहारा और सहारा समय टी वी चैनल से जुड़े हुए हैं। इतने लंबे समय तक उन्होंने संस्था के लिए पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ कार्य किया। कठिन परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और अनिश्चितताओं के बावजूद उन्होंने समाचार संकलन, संपादन, प्रिंटिंग प्रेस और वितरण से जुड़े कार्यों को लगातार आगे बढ़ाया, ताकि आम जनमानस तक सही और सटीक जानकारी पहुंचती रहे।
वार्ता में यह भी बताया गया कि वर्ष 2013 से अब तक अधिकांश कर्मचारियों को नियमित और पूरा वेतन नहीं मिल पाया है। कभी किसी वर्ष में केवल चार या पांच माह का वेतन दिया गया, तो कभी ‘टोकन’ के नाम पर आंशिक भुगतान किया गया। इससे कर्मचारियों और उनके परिवारों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। कई कर्मचारियों ने अपने बच्चों की पढ़ाई, चिकित्सा और घरेलू जरूरतों को बड़ी मुश्किल से पूरा किया, लेकिन फिर भी उन्होंने संस्थान के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाना नहीं छोड़ा।
कर्मचारियों ने उप श्रमायुक्त को यह भी बताया कि अब तक उन्हें ग्रेच्युटी, भविष्य निधि (पीएफ) और अन्य वैधानिक लाभों का भुगतान नहीं किया गया है। जिन कर्मचारियों ने अपनी पूरी कार्यशील उम्र संस्था को दे दी, वे आज भी अपने वैधानिक अधिकारों के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। कर्मचारियों ने सवाल उठाया कि जब वर्षों से बकाया वेतन और ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं हुआ, तो अब मात्र तीन माह का वेतन देकर सेवा समाप्त करने की बात कैसे की जा सकती है।
वार्ता के दौरान पत्रकारों ने भावुक शब्दों में कहा कि उन्होंने अपने खून-पसीने से खबरों को आकार दिया। कई बार जोखिम भरी परिस्थितियों में भी उन्होंने रिपोर्टिंग की, प्रिंटिंग प्रेस में देर रात तक काम किया और समाज की आवाज बनने का प्रयास किया। इसके बावजूद आज उन्हें यह महसूस कराया जा रहा है कि उनकी वर्षों की सेवा का कोई मूल्य नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि प्रबंधन समिति उन्हें सेवा से मुक्त करना चाहती है, तो पहले 2013 से अब तक का समस्त बकाया वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य देय भुगतान किया जाना चाहिए।
कर्मचारियों ने यह भी मांग रखी कि जिन पत्रकारों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों के अनुसार सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष है, उन्हें उस पूरी अवधि को जोड़कर देय भुगतान किया जाए। इससे कर्मचारियों को सम्मानजनक विदाई और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा मिल सकेगी।
इस अवसर पर उप श्रमायुक्त शक्ति सेन मौर्य ने लोकल प्रबंधन से सीधे प्रश्न किया कि क्या प्रबंधन समिति की ओर से इस संबंध में कोई लिखित आदेश या आधिकारिक निर्देश प्राप्त हुआ है। इस पर लोकल प्रबंधन ने स्पष्ट रूप से बताया कि उनके पास फिलहाल कोई भी लिखित आदेश उपलब्ध नहीं है और कर्मचारियों को जो भी जानकारी दी गई है, वह केवल मौखिक रूप से दी गई है।
लोकल प्रबंधन के इस बयान के बाद कर्मचारियों ने अपनी चिंता व्यक्त की और कहा कि बिना लिखित आदेश के इस प्रकार की मौखिक बातें कर्मचारियों के भविष्य को लेकर भ्रम और असुरक्षा पैदा करती हैं। कर्मचारियों ने यह भी कहा कि श्रम कानूनों के अनुसार किसी भी कर्मचारी की सेवा समाप्ति, इस्तीफा या भुगतान से संबंधित प्रक्रिया लिखित आदेश और नियमानुसार ही होनी चाहिए।
उप श्रमायुक्त ने वार्ता के दौरान कर्मचारियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि श्रम कानून कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए बने हैं और बिना वैधानिक प्रक्रिया के किसी भी कर्मचारी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बकाया वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य वैधानिक देयों का भुगतान कर्मचारियों का अधिकार है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

