55 साल की तपस्या सफल,  मुरादाबाद के चिरंजी लाल पद्मश्री से होंगे सम्मानित

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55 साल की तपस्या सफल,  मुरादाबाद के चिरंजी लाल पद्मश्री से होंगे सम्मानित


कभी मुफलिसी में खुद के तराशे बर्तन बेचने को मजबूर थे चिरंजीलाल

25 जनवरी को केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 76 वर्षीय पीतल शिल्पकार चिरंजीलाल को 'पद्म श्री' देने की हुई थी घोषणा

मुरादाबाद, 22 जून (हि.स.)। मुरादाबाद के थाना सदर कोतवाली क्षेत्र स्थित कटरा पूरन जाट कंजरी सराय निवासी पीतल शिल्पकार चिरंजीलाल यादव की 55 साल की तपस्या सफल हो गई। चिरंजीलाल को मंगलवार 23 जून को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों 'पद्म श्री' के सम्मान से नवाजा जाएगा। 25 जनवरी को केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 76 वर्षीय पीतल शिल्पकार चिरंजीलाल को 'पद्म श्री' देने की घोषणा हुई थी। कभी मुफलिसी में खुद के तराशे बर्तन बेचने को मजबूर चिरंजीलाल के नाम से भी मुरादाबाद की पहचान हुआ करेगी। चिरंजीलाल गृह मंत्रालय के निमंत्रण पर अपने बेटे खूब सिंह और अन्य परिजनों के साथ दिल्ली में यह सम्मान ग्रहण करने जा रहे है।

शिल्प गुरु चिरंजी लाल यादव ने साेमवार काे बताया कि सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने आजीविका के लिए पीतल पर नक्काशी का काम सीखना शुरू कर दिया। गुरु अमर सिंह ने उन्हें नक्काशी का हुनर सिखाया। उन्होंने मेहराव वर्क, वर्मा बिदर वर्क, पंचरंगा वर्क, अंगूरी बर्क, फाइन वर्क, मरोड़ी वर्क का काम भी किया। शिल्प गुरु अपनी कला का प्रदर्शन केंद्र सरकार की पहल पर 2015 में जर्मनी के फ्रैंकफुर्त में कर चुके हैं।

चिरंजीलाल यादव वर्ष 2010 में बांग्लादेश की राजधानी ढाका और मलेशिया में गए थे। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरकार ने उनको राज्य दक्षता पुरस्कार के रूप में पहला अवॉर्ड दिया था। इसके बाद 1994, 1995, 1998 और 1999 में राज्य दक्षता पुरस्कार मिले थे। 2008 में नेशनल मेरिट अवार्ड और 2019 में शिल्प गुरु का अवॉर्ड भी मिला था।

संघर्ष के दिनों को याद कर छलक उठती हैं आंखें

चिरंजीलाल की आंखें संघर्ष के दिनों को याद कर छलक उठती हैं। 21 साल की उम्र से पीतल पर मरोड़ी और कलम का बारीक काम करने वाले इस फनकार की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं है, बल्कि 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' (ओडीओपी) और 'पीएम विश्वकर्मा योजना' जैसी सरकारी मुहिमों से मिली संजीवनी की भी एक जीती-जागती मिसाल है।

साल 1980 की वह मुफलिसी जब कौड़ियों के भाव बेचने पड़े अपने ही तराशे बर्तन

चिरंजीलाल जब अपने पुराने दिनों को याद करते हैं, तो उनका गला रुंध जाता है। वे बताते हैं कि साल 1980 का दशक उनके जीवन का सबसे भारी और संघर्षपूर्ण दौर था। उस समय कला की कद्र कम थी और इस बारीक काम की मजदूरी नाम मात्र की मिलती थी। हालात इतने बदतर हो गए थे कि परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें अपने ही हाथों से बनाए गए बेशकीमती और बारीक नक्काशी वाले आइटम औने-पौने दामों पर बेचने पड़े थे। कई बार ऐसा लगा कि इस पुश्तैनी काम को छोड़ दें, लेकिन कला के प्रति उनके जुनून ने उन्हें रुकने नहीं दिया। आज करीब 55 साल बाद जब वे पलटकर देखते हैं, तो उन्हें सुकून मिलता है कि उन्होंने उस मुफलिसी में भी अपनी छेनी-हथौड़ी का साथ नहीं छोड़ा।

गुरु की विरासत और शिष्यों की नई फौज ने बढ़ाया मान

चिरंजीलाल की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनके गुरु अमर सिंह का बहुत बड़ा हाथ है। अमर सिंह को भी पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका था। अपने गुरु से मिली पीतल पर मरोड़ी और कलम के बारीक काम की इस नायाब कला को चिरंजीलाल ने सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया। आज उनके बेटे खुश सिंह राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कार (नेशनल अवार्ड) से सम्मानित हैं। इसके अलावा उनके शिष्य जितेंद्र कुमार को भी स्टेट अवार्ड मिल चुका है। उनके कई अन्य शागिर्द आज बड़ी-बड़ी एक्सपोर्ट फर्मों में अपनी कला का लोहा मनवा रहे हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / निमित कुमार जायसवाल

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