लोस चुनाव : 2019 में 40 सीटों पर भाजपा को मिला था 50 प्रतिशत से ज्यादा मत

लोस चुनाव : 2019 में 40 सीटों पर भाजपा को मिला था 50 प्रतिशत से ज्यादा मत
लोस चुनाव : 2019 में 40 सीटों पर भाजपा को मिला था 50 प्रतिशत से ज्यादा मत


लखनऊ, 04 अप्रैल (हि.स.)। पिछला चुनाव अगले चुनाव के लिए हर समय मानक नहीं हो सकता, लेकिन दो चुनावों से जो ट्रेंड चल रहा है। उस आधार पर कहा जा सकता है कि भाजपा उप्र में 2014 की स्थिति दोहरा सकती है, जब उसे स्वयं 71 सीटों पर विजय हासिल हुई थी। जबकि उसके सहयोगी अपना दल (एस) को दो सीटें मिली थी। प्रदेश में 2014 में नरेन्द्र मोदी का वेब था, तब भाजपा को 42.35 प्रतिशत मत मिले थे। वहीं 2019 में सपा-बसपा गठबंधन के बाद भी भाजपा के 7.35 प्रतिशत वोट बढ़ गये और उसे 49.98 प्रतिशत वोट मिले।

भाजपा के सहयोगी अपना दल एस को 1.01 प्रतिशत मत मिले थे। दोनों ने मिलकर प्रदेश में 50.57 प्रतिशत वोट पाये थे। यह स्थिति तब थी, जब दो बड़ी पार्टियां सपा और बसपा एक साथ थी। उसके बावजूद भाजपा ने प्रदेश में 62 सीटें जीत लीं। सपा-बसपा के गठबंधन का असर इतना जरूर रहा कि 7.35 प्रतिशत वोट बढ़ने के बावजूद भाजपा की नौ सीटें कम हो गयीं।

वहीं दूसरी तरफ देखें तो उप्र में पिछली बार 40 सीटें ऐसी थीं,जिन पर भाजपा उम्मीदवारों ने पचास प्रतिशत से ज्यादा मत पाये। यह पचास प्रतिशत ऐसा तिलिस्म है, जिसका मतलब सब मिलाकर भी उसे हरा नहीं सकते। वहीं 2014 के चुनाव में मात्र 11 सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार पचास प्रतिशत से ज्यादा मत पाये थे।

राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि में 2014 में मतों का बंटवारा ने भाजपा को जिताया, जबकि 2019 में भाजपा की ताकत ने भाजपा को जिताया। 2024 में भी इनके कम होने के बजाय अधिक होने के ही आसार दिख रहे हैं। इस कारण भाजपा 2014 के रिकार्ड को भी तोड़ दे तो इस पर आश्चर्य नहीं होगा।

बसपा के मतों को देखें तो उसके मत प्रतिशत में 2014 की अपेक्षा 2019 में मात्र .34 प्रतिशत की कमी आयी थी, जबकि आधी सीटों पर ही गठबंधन के तहत बसपा ने चुनाव लड़ा था। वहीं 2009 की अपेक्षा 2014 में बसपा के वोटों में 7.82 प्रतिशत की कमी थी। 2014 में बसपा को एक सीट भी उप्र में नहीं मिली थी। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में बसपा का बेस वोट बैंक 19 प्रतिशत के आस-पास है।

वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र का कहना है कि राम मंदिर के निर्माण के बाद भाजपा का वोट बैंक पिछले चुनाव की अपेक्षा बढ़ता ही दिख रहा है। अब अंतिम समय तक कुछ विशेष उठा-पटक न हो तो भाजपा 2014 के अपने रिकार्ड को भी तोड़ सकती है। हालांकि अभी समय है, इसमें सपा और बसपा को सुधार करना चाहिए।

वहीं राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि भाजपा का जबरदस्त प्रचार और सपा का उम्मीदवारों के प्रति अनिश्चय भाव भाजपा को आगे बढ़ाता जा रहा है। इस स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि भाजपा सारे रिकार्ड तोड़ सकती है।

हिन्दुस्थान समाचार/उपेन्द्र/राजेश

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