अवध विश्वविद्यालय : 'सस्टेनेबल टूरिज्म मैनेजमेंट' कार्यशाला में वित्तीय, स्वदेशी और सांस्कृतिक सततता पर मंथन

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अवध विश्वविद्यालय : 'सस्टेनेबल टूरिज्म मैनेजमेंट' कार्यशाला में वित्तीय, स्वदेशी और सांस्कृतिक सततता पर मंथन


अयोध्या, 21 अगस्त (हि.स.)। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के व्यवसाय प्रबंधन एवं उद्यमिता विभाग में चल रही एक सप्ताह की राष्ट्रीय कार्यशाला “सस्टेनेबल टूरिज्म मैनेजमेंट” के पांचवें दिन शुक्रवार को विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में देश के प्रमुख संस्थानों से आए विषय विशेषज्ञों ने सतत पर्यटन के आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय पहलुओं पर अपने विचार साझा किए।

डॉ. राकेश कुमार ने पर्यटन प्रबंधन में वित्तीय पक्षों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी सतत पर्यटन मॉडल का आर्थिक रूप से व्यवहार्य होना आवश्यक है। उन्होंने पर्यटन क्षेत्र में राजस्व सृजन, लागत नियंत्रण, स्मार्ट निवेश और मूल्य निर्धारण के साथ स्थानीय समुदायों के आर्थिक हितों की रक्षा पर विशेष जोर दिया।

सिक्किम विश्वविद्यालय के प्रो. अमित कुमार सिंह ने सिक्किम के स्वदेशी समुदायों के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि स्थानीय सहभागिता और पारंपरिक जीवनशैली प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण हैं। यह मॉडल पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

सांस्कृतिक सततता और ‘हैप्पी टूरिज्म’: डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के प्रो. लवकुश मिश्रा ने कहा कि पर्यटन केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पर्यटकों को एक सकारात्मक और सार्थक अनुभव दे। उन्होंने सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय मूल्यों के संरक्षण के साथ पर्यटकों व स्थानीय निवासियों के बीच संतुलन बनाए रखने का सुझाव दिया।

सत्रों के समापन पर यह निष्कर्ष निकला कि पर्यटन का वास्तविक सतत विकास तभी संभव है जब आर्थिक लाभ, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक पहचान के बीच समग्र समन्वय हो।

हिन्दुस्थान समाचार / पवन पाण्डेय

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