भारत और हिन्दी प्रेम कामिल बुल्के के चिंतन का केंद्रीय भाव रहा : नीला प्रसाद

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भारत और हिन्दी प्रेम कामिल बुल्के के चिंतन का केंद्रीय भाव रहा : नीला प्रसाद


--इविवि हिन्दी विभाग का प्रथम फ़ादर कामिल बुल्के स्मृति व्याख्यान

प्रयागराज, 28 मई (हि.स)। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा गुरूवार को अपने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरा छात्र की स्मृति में प्रथम फादर बुल्के व्याख्यान का आयोजन हिन्दी विभाग के सत्यप्रकाश मिश्र सभा कक्ष में किया गया।

इस अवसर पर हिन्दी की सुपरिचित कथाकार नीला प्रसाद ने फादर कामिल बुल्के के जीवन-संघर्ष का उल्लेख किया। उनके हिन्दी प्रेम, भारत प्रेम और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रति असीम लगाव को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कामिल बुल्के ईसाई आध्यात्मिक साहित्य और हिन्दी साहित्य के प्रति पुल की तरह थे। वे मानते थे कि हिन्दी राष्ट्रीय एकता और समन्वय के लिए सबसे महत्वपूर्ण भाषा है।

उन्होंने कहा कि फ़ादर बुल्के साहित्यिक साधना को अपनी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा मानते थे। हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्थापक अध्यक्ष डॉ धीरेन्द्र वर्मा को वे अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी में शोध प्रबंध प्रस्तुत करने वाले वे पहले शोध छात्र रहे हैं। तत्कालीन कुलपति प्रो अमरनाथ झा ने उनके लिए शोध-प्रबंध को हिंदी में प्रस्तुत करने के लिए नियम में बदलाव किया। फादर कामिल बुल्के रामकथा के विकास पर जीवन भर शोधकार्य करते रहे। यहां से मुक्त होने के बाद भी वे विभाग के शिक्षकों के निरंतर सम्पर्क में बने रहे। ईसा, तुलसी और रामकथा उनके साहित्य चिंतन एवं लेखन के केंद्र में थे।

हिन्दी विभाग की अध्यक्ष प्रो. लालसा यादव ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी विभाग के लिए यह गौरव और गर्व का क्षण है कि हम अपने विभाग के महानतम पुरा छात्र को याद कर रहे हैं। उनकी स्मृति को स्थाई करने के लिए विभाग में स्थापित होने वाली वीथिका की अनुमति प्रदान करने के लिए विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव का सम्पूर्ण विभाग की ओर से आभार ज्ञापित करते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. प्रणय कृष्ण ने करते हुए कहा कि गैर सनातन परम्पराओं ने रामकथा को कैसे ग्रहण किया-यह फ़ादर कामिल बुल्के अपने ‘रामकथा’ सम्बन्धी शोध में दिखाते हैं। डॉ लोहिया ने भारत माता की संकल्पना में - राम का चरित्र, कृष्ण का हृदय, शिव का मस्तिष्क चाहा था। उन्होंने कहा कि न रामकथा एक है, न तुलसी। परम्पराओं की बहुलता होती है। सारी परम्पराओं को एक रंग में रंगने का प्रयास उचित नहीं है।

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए हिंदी विभाग के प्रो. संतोष भदौरिया ने कहा कि यह खेद प्रकट करने का अवसर भी है कि अपने विभाग के इतने ख्यातिलब्ध पुराछात्र को पहले क्यों नहीं याद कर सके? विस्मृति के इस दौर में विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रतिष्ठित पुराछात्रों को, उनके योगदान को याद करना हमारा एक जरूरी कार्यभार होना चाहिए। फ़ादर कामिल बुल्के का भारत के गांवों और जनपदीय बोलियों से गहरा प्रेम था। उन्होंने कहा कि स्मृतियों से इतिहास बनता है। स्मृतियों को संरक्षित करना इतिहास लेखन के लिए ज़रूरी है। विभाग के हिंदी परिषद प्रकाशन से उनके पत्र, उन पर लिखे गये संस्मरण को प्रकाशित करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

अन्त में डॉ. सूर्यनारायण ने विभाग से प्रकाशित होने वाली पत्रिका का एक अंक फादर कामिल बुल्के पर केंद्रित करके निकालने का प्रस्ताव रखा। कार्यक्रम का संचालन फादर कामिल बुल्के स्मृति वीथिका समिति के संयोजक प्रो. कुमार बीरेंद्र ने एवं अतिथियों का स्वागत प्रो.भूरेलाल ने किया।

इविवि की पीआरओ प्रो जया कपूर ने बताया कि कार्यक्रम में मुख्य रुप से अधिष्ठाता महाविद्यालय विकास प्रो. अजय जैतली, प्रो. हेरम्ब चतुर्वेदी, प्रो. अनीता गोपेश, प्रो चन्दा देवी, हरीशचंद्र पाण्डे, असरार गाँधी, प्रियदर्शन मालवीय, प्रो. शिवप्रसाद शुक्ला, प्रो. राकेश सिंह, प्रो. सरोज सिंह, आनंद मालवीय, प्रवीण शेखर, प्रो. बसंत त्रिपाठी, मनोज पाण्डेय, डॉ. मीना कुमारी, डॉ. जनार्दन, डॉ. प्रेमशंकर, रूपम मिश्र, डॉ. दीनानाथ, डॉ. सुजीत कुमार सिंह, डॉ. सुरभि त्रिपाठी, डॉ बृजेश यादव, डॉ. अमितेश कुमार, डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता, डॉ. संतोष कुमार सिंह, प्रतिमा सिंह, शिवांगी गोयल सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र

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