बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर डिजिटल दुनिया और एआई का बढ़ता प्रभाव, विशेषज्ञों ने जताई चिंता

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बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर डिजिटल दुनिया और एआई का बढ़ता प्रभाव, विशेषज्ञों ने जताई चिंता




गोरखपुर, 24 अक्टूबर (हि.स.)। तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश, डिजिटल दुनिया, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का बच्चों एवं किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। बाल्यावस्था और किशोरावस्था जीवन के ऐसे महत्वपूर्ण चरण हैं, जिनमें शरीर के साथ मस्तिष्क का भी तेजी से विकास होता है। इस दौरान बदलती परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई होने पर बच्चों और युवाओं में विभिन्न प्रकार की मानसिक समस्याएं उभर सकती हैं। इन बढ़ती चुनौतियों को लेकर देशभर के मनोरोग विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।

उत्तर प्रदेश के मनोरोग विशेषज्ञों के संगठन एसोसिएशन ऑफ क्लिनिकल साइकियाट्री सोसाइटी का दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन यूपीआईपीएस-2026 शनिवार को होटल रेडिसन ब्लू, गोरखपुर में शुरू हुआ। सम्मेलन का विषय “ यंग माइंड इन ट्रांजिशन फ्राम अवेयरनेस टू एक्शन ” रखा गया है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर की निदेशक डॉ. विभा दत्ता तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव उपस्थित रहे।

सम्मेलन में देश और प्रदेश के प्रख्यात मनोरोग विशेषज्ञ एक मंच पर जुटे हैं। दो दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं, उनके शुरुआती लक्षणों की पहचान, समय पर उपचार तथा बचाव के उपायों पर विशेषज्ञ अपने अनुभव और शोध साझा कर रहे हैं।

सोशल मीडिया की काल्पनिक दुनिया से वास्तविक जीवन में सामंजस्य जरूरी

सम्मेलन के प्रथम सत्र में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रील्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और अन्य डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा हुई। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज , बेंगलुरु के चाइल्ड साइकियाट्री विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. (प्रो.) शेखर शेषाद्री ने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने बच्चों और किशोरों के विकसित होते मन एवं मस्तिष्क पर डिजिटल माध्यमों के प्रभाव, सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं तथा आभासी दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर चर्चा की। सत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि बच्चों में सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों की समय रहते पहचान करना और उन्हें उचित मार्गदर्शन देना मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

असामान्य व्यवहार और नशे की प्रवृत्ति की समय पर पहचान जरूरी

द्वितीय सत्र में बच्चों एवं किशोरों की व्यवहार संबंधी समस्याओं पर चर्चा की गई। वरिष्ठ परामर्शदाता मनोरोग चिकित्सक डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव, प्रयागराज ने नशे की प्रवृत्ति, गलत व्यवहार तथा बार-बार दोहराए जाने वाले असामान्य व्यवहारों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने ऐसे व्यवहारों को समय रहते पहचानने और उचित चिकित्सकीय परामर्श एवं प्रबंधन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

तृतीय सत्र में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), लखनऊ के मानसिक रोग विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने युवाओं में विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों के दुरुपयोग पर जानकारी दी। उन्होंने नशे की पहचान, इसके संभावित दुष्परिणामों तथा युवाओं को नशे से बचाने के उपायों पर चर्चा की।

मूड डिसऑर्डर और आधुनिक मनोरोग चिकित्सा पर विशेषज्ञों ने रखे विचार

चतुर्थ सत्र में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के डॉ. निशांत गोयल ने किशोरों और नवयुवकों में होने वाली मूड डिसऑर्डर संबंधी समस्याओं पर व्याख्यान दिया। उन्होंने अत्यधिक अवसाद, असामान्य रूप से बढ़ी हुई प्रसन्नता और भावनात्मक असंतुलन जैसी स्थितियों को समझने तथा उनके आधुनिक चिकित्सकीय उपचार के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

पंचम सत्र में मनोरोग चिकित्सा की आधुनिक विधि न्यूरोमॉड्यूलेशन पर चर्चा हुई। देहरादून मेडिकल कॉलेज के मनोरोग चिकित्सक डॉ. शोभित गर्ग ने इस क्षेत्र में भारत में हो रहे नए शोध और उपचार की उभरती संभावनाओं के बारे में जानकारी दी। इस सत्र में मानसिक स्वास्थ्य के उपचार में आधुनिक तकनीकों की भूमिका पर विचार-विमर्श किया गया।

छठे सत्र में बचपन में मस्तिष्क के विकास से जुड़े विकारों और उनके चिकित्सकीय प्रबंधन पर विस्तार से चर्चा हुई। केजीएमयू, लखनऊ की चाइल्ड साइकियाट्री यूनिट के विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक अग्रवाल ने बाल्यावस्था में मस्तिष्क के विकास में आने वाली समस्याओं, उनके प्रभाव और उपचार संबंधी पहलुओं की जानकारी दी।

नाबालिग मरीजों के उपचार में चिकित्सकीय और नैतिक दुविधाओं पर मंथन

सम्मेलन के प्रथम दिन के अंतिम सत्र में NIMHANS की फोरेंसिक साइकियाट्री यूनिट के विभागाध्यक्ष डॉ. (प्रो.) सुरेश बड़मत ने मनोरोग विशेषज्ञों के सामने आने वाली चिकित्सकीय और नैतिक दुविधाओं पर महत्वपूर्ण विचार रखे।

उन्होंने बताया कि मनोरोग चिकित्सा के दौरान कई बार ऐसी परिस्थितियां सामने आती हैं, जिनमें मरीज की गोपनीयता, सुरक्षा, उपचार की सहमति और समाज के हितों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। विशेष रूप से तब कठिनाई बढ़ जाती है, जब कोई नाबालिग मरीज बिना अभिभावक के परामर्श के लिए पहुंचे और उसके सामने ऐसी परिस्थितियां हों, जिनसे स्वयं उसे या अन्य लोगों को नुकसान पहुंचने की आशंका हो।

ऐसे मामलों में चिकित्सक के लिए यह समझना आवश्यक होता है कि मरीज की जानकारी अभिभावक या संबंधित प्राधिकारी के साथ कब और किस सीमा तक साझा की जानी चाहिए तथा उपचार के लिए वैध सहमति कैसे प्राप्त की जाए। उन्होंने नाबालिगों की चिकित्सकीय सहमति, अभिभावकीय भूमिका और कानूनी-नैतिक दायित्वों से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।

जागरूकता से कार्रवाई तक पहुंचने पर जोर

यूपीआईपीएस-2026 के पहले दिन विभिन्न सत्रों में बाल एवं किशोर मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया गया। विशेषज्ञों की चर्चाओं में समय रहते लक्षणों की पहचान, परिवार की सक्रिय भूमिका, उचित चिकित्सकीय परामर्श, नशे से बचाव और डिजिटल माध्यमों के संतुलित उपयोग जैसे विषय प्रमुख रहे।

सम्मेलन का उद्देश्य केवल मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना ही नहीं, बल्कि उनके प्रभावी समाधान की दिशा में व्यावहारिक कदमों पर विचार करना भी है। तेजी से बदलती जीवनशैली और तकनीकी परिवेश के बीच बच्चों एवं किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा आज परिवार, समाज और चिकित्सा जगत की साझा जिम्मेदारी बनती जा रही है।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

Livevns.news Desk
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