धर्माचरण की भारतीय परंपरा का प्रमाण है मन्वंतर आख्यान : आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण

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धर्माचरण की भारतीय परंपरा का प्रमाण है मन्वंतर आख्यान : आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण


मुरादाबाद, 05 जून (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जनपद मुरादाबाद में सीएल गुप्ता आई इंस्टीट्यूट के सभागार में आयोजित भागवत सप्ताह के दूसरे दिन शुक्रवार को अयोध्या से आए आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत महापुराण में उसके दस लक्षणों के अंतर्गत मन्वंतर कथा एक है। भारतीय काल गणना चौदह मनुओं के कार्यकाल से परिभाषित की जाती है। चतुर्युगी के इकहत्तर बार बीतने से एक मनु का काल पूरा होता है। एक मनु से दूसरे मनु के काल परिवर्तन को मन्वंतर कहा जाता है। धर्माचरण की भारतीय परंपरा का प्रमाण मन्वंतर हैं।

आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज ने आगे कहा कि वर्तमान समय वैवस्वत मन्वन्तर कहलाता है जो चौदह मनुओं के क्रम में सातवां है। मंवन्तर कथा का तात्पर्य धर्म की संस्थापना करते हुए मानव जाति के परम्परागत रूप से आगे बढ़ने में निहित है। स्वायंभुव, स्वरोचिष, तामस, चाक्षुसी तथा वैवस्वत आदि के क्रम से भारत की धर्मनिष्ट जीवनवृत्ति का जो क्रमिक विकास हुआ है वह भागवत में प्रतिपादित है। भगवान के समस्त अवतारों को देश और काल में निरूपित करते हुए मन्वंतर कथाओं का उल्लेख किया गया है।

आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण जी महाराज ने मनु की वंश परंपरा में महाराज उत्तानपाद, उनके पुत्र ध्रुव की भक्ति तथा सम्राट प्रियव्रत की वंश परंपरा में भगवान ऋषभदेव का आख्यान कहा।मनु की तीन कन्याओं के वंश विस्तार को कहते हुए अकुति और देवहूति के अतिरिक्त प्रसूति की कन्या देवी सती का चरित्र सुनाते हुए भगवान विष्णु और शिव की यज्ञरुपता और उनके एकत्व का प्रतिपादन किया। कर्म प्रपंच में उलझे हुए प्रजापति दक्ष ने शिवत्व की अवमानना की और उनका यज्ञ भंग हो गया। दक्ष के शिवद्रोह को जानते हुए उनके यज्ञ में आमंत्रित होते हुए भी भगवान शिव और ब्रह्मा जी नहीं गए। इस प्रकार परमात्मा के उत्पत्ति, पालक और संहार तीनों लीलाओं के अधिष्ठानभूत त्रिदेव के एकत्र होने की चर्चा की गई।

हिन्दुस्थान समाचार / निमित कुमार जायसवाल

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