वीर अब्दुल हमीद की स्मारक बेहाल देख दंग रह गए क्रांतिकारी लेखक शाह आलम राना, पोस्टर पर्चे फाड़े

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वीर अब्दुल हमीद की स्मारक बेहाल देख दंग रह गए क्रांतिकारी लेखक शाह आलम राना, पोस्टर पर्चे फाड़े


औरैया, 13 मई (हि.स.)। पाकिस्तान से हुए 1965 युद्ध के नायक वीर अब्दुल हमीद ने देश के लिए अपना सर्वोच्च योगदान दिया। मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित हुए थे। लेकिन उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद भरथना कस्बे में इटावा चौराहे पर लगी उनकी प्रतिमा बेहाल हालत में हैं।

चम्बल मिशन अभियान के तहत यहाँ से गुजर रहे क्रांतिकारी परंपरा के दस्तावेजी लेखक और महुआ डाबर एक्शन के महानायक के वंशज डॉ. शाह आलम राना, उनके साथियों सुनील कुमार और नरेंद्र त्रिपाठी ने जब प्रतिमा को इस हाल में देखा, तो दंग रह गए।उनकी प्रतिमा को पोस्टरों से ढँक दिया गया था। डॉ. शाह आलम राना और उनके साथियों ने स्मारक स्थल को साफ़ किया और इस पर चिपके पोस्टर पर्चे फाड़ कर फेंक दिए।

चम्बल मिशन अभियान के तहत क्रांतिकारी नायकों की स्मृतियों को जीवित करने के अभियान के लिए यात्रा कर लोगों को जागरूक कर रहे डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि नगर पालिका और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की ये जिम्मेदारी है कि वह अपने नायकों के स्मारकों को साफ़ सुथरा सहेज कर रखें। आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसे महापुरुषों के इतिहास को सहेजना बेहद ज़रूरी है। अगर नगर पालिका नहीं करती है तो वह अगली बार तैयारी से आयेंगे और स्मारक का स्वरूप बदल देंगे।

चम्बल फाउंडेशन के संस्थापक शाह आलम राना चम्बल में 2800 किलोमीटर से अधिक दूसरी अकेले साइकिल से यात्रा कर चुके हैं। शाह आलम ने चम्बल की परेशानियों, उसकी संस्कृति को जाना। साथ ही चम्बल के भूले बिसरे क्रांतिकारियों के बारे में लोगों को बताया। और 'बीहड़ में साइकिल' नाम की किताब लिखी। इस यात्रा के लिए उन्हें इंटरनेशनल ओपन यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूमैनिटी हेल्थ साइंस एंड पीस, कैलिफोर्निया ने डी. लिट की मानद उपाधि दी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील कुमार

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