बीएचयू के प्रो.मनोरंजन साहू और प्रो. ऋत्विक सान्याल को मिला पद्मश्री पुरस्कार



बीएचयू के प्रो.मनोरंजन साहू और प्रो. ऋत्विक सान्याल को मिला पद्मश्री पुरस्कार


—प्रो.साहू आयुर्वेद संकाय के क्षार सूत्र विशेषज्ञ, बवासीर के इलाज में बड़ी पहल की, प्रो. सान्याल ध्रुपद गायन के सशक्त हस्ताक्षर, 60 के दशक में लुप्त गायन शैली को दी नई ऊंचाई

वाराणसी, 26 जनवरी (हि.स.)। भारत सरकार ने 74वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा की। इनमें वाराणसी के दो विभूति भी शामिल हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के आयुर्वेद संकाय के क्षार सूत्र विशेषज्ञ रहे प्रो. मनोरंजन साहू और संगीत संकाय के डीन रहे प्रख्यात ध्रुपद गायक पंडित ऋत्विक सान्याल को पद्मश्री पुरस्कार दिया गया है। इसकी जानकारी मिलते ही दोनों विभूतियों को उनके शुभचिंतकों और साथी आचार्यो ने बधाई दी।

प्रो.मनोरंजन साहू बीएचयू आयुर्वेद संकाय के डीन रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल में बीएचयू में वर्ष 2013 में देश का पहला क्षार सूत्र केंद्र बनवाया था। प्रो. साहू सामाजिक संस्थाओं में भी बवासीर का मुफ्त इलाज किया करते थे। मूल रूप से पश्चिम बंगाल के मिदनापुर निवासी प्रो. मनोरंजन साहू ने कोलकाता के जेबी रॉय स्टेट आयुर्वेदिक कॉलेज से वर्ष 1977 में स्नातक किया । 1982 और 1986 में बीएचयू में आयुर्वेद में एमडी और शोध करने के बाद काठमांडू चिकित्सा संस्थान में लेक्चरर नियुक्त हुए। वर्ष 1993 में बीएचयू आयुर्वेद फैकल्टी के शल्य तंत्र विभाग में रीडर नियुक्त हुए। इसके बाद वे 2003 में प्रोफेसर बने। प्रो. साहू को आयुष विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, सरकार द्वारा 2008 में सम्मान, 2014 में वैद्य सुंदरलाल जोशी मेमोरियल अवार्ड सहित अन्य पुरस्कार मिल चुका है। दो शोध का पेटेंट और 32 अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन भी प्रो. साहू ने किया है। दुनिया के कई देशों में आयोजित आयुर्वेद सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके है।

—प्रख्यात गायक पंडित ऋत्विक सान्याल ध्रुपद गायन के सशक्त हस्ताक्षर

बीएचयू संगीत संकाय के डीन रहे जाने माने ध्रुपद गायक पंडित ऋत्विक सान्याल गायन के इस विधा के सशक्त हस्ताक्षर है। मूल रूप से कटियार बिहार के निवासी प्रो. सान्याल को संगीत की शिक्षा उनकी मां रानू सान्याल ने दिया था। रानू सान्याल भी गायिका और लेखिका रही। पिता प्रो. बटुक सान्याल फिलॉसफी के विद्यान रहे। प्रो. सान्याल ने डागर घराने के विख्यात वीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर और गायक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर से भी संगीत की शिक्षा ली।

दर्शन शास्त्र में परास्नातक करने के बाद संगीत में स्नातकोत्तर करने के बाद शोध प्रो. प्रेमलता शर्मा के निर्देशन में किया। इसके बाद बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय में डीन भी रहे। लगभग 40 साल से प्रो. सान्याल विश्व के अलग-अलग देशों में ध्रुपद शो में भाग लेते रहे है। प्रो. सान्याल के कई शिष्य ध्रुपद, ख्याल एवं वाद्य संगीत आदि विधा के स्थापित कलाकार है।

प्रो.सान्याल को केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2013, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2002 उत्तर प्रदेश रत्न 2016, ध्रुपद सम्मान जयपुर 2007, ध्रुपद के क्षेत्र में योगदान के लिए ध्रुपद मेला वाराणसी द्वारा स्वाति तिरुनल सम्मान 1995 मिल चुका है। प्रो सान्याल आईसीसीआर आकाशवाणी, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक सस्थाओं के सम्मानित सदस्य भी हैं.

प्रो.सान्याल ने ध्रुपद की डागर परम्परा और धुपद आलाप की विशिष्ट तकनीक, कण्ठ संस्कार एवं परम्परागत व संस्थागत शिक्षण की अपनी एक अलग पद्धति विकसित कर अपनी अलग पहचान बनाई। ध्रुपद गायन शैली बनारस और भारतीय संगीत की पुरानी थाती रही है। 60 के दशक में यह शैली लुप्त सी हो गई थी, मगर प्रो. सान्याल के प्रयास से फिर युवा संगीत साधक इससे अपनी पहचान बना रहे है।

पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रो. ऋत्विक सान्याल ने कहा कि यह पुरस्कार संगीत जगत और बाबा विश्वनाथ को समर्पित है। पुरस्कार और सम्मान से और बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है। यह जिम्मेदारी का अहसास कराते हैं कि आगे और काम करना है।

हिन्दुस्थान समाचार/श्रीधर

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