मृत्यु के भय को समाप्त करती है श्रीमद्भागवत कथा : स्वामी राजेंद्रदास

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मृत्यु के भय को समाप्त करती है श्रीमद्भागवत कथा : स्वामी राजेंद्रदास


गोरखपुर, 25 सितंबर (हि.स)l युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन, वृंदावन से पधारे कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी श्री राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज ने व्यासपीठ से श्रद्धालुओं को भागवत कथा के माध्यम से जीवन, मृत्यु, संत-महिमा और गोसेवा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा जीवन का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए मृत्यु के भय को समाप्त करती है।

कथा प्रारंभ करने से पूर्व कथाव्यास ने गीतावली ग्रंथ के उत्तरकांड के पदों का गायन कर श्रोताओं को भगवान श्रीराम के चरित्र के भाव में भावविभोर कर दिया। इसके बाद भजन के माध्यम से उन्होंने कहा कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है। यह संसार मुर्दों का गांव है। यहां वही जीवित है, जो नित्य परमात्मा से स्वयं को जोड़ता है। जो संत स्वयं भगवान के आश्रित होकर अपने शरणागतों का आश्रय बनते हैं, वे अमर हो जाते हैं। उन्होंने संत शिरोमणि शुकदेव जी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि शुकदेव जी ऐसे महान संत थे, जिन्होंने पृथ्वी का अन्न-जल ग्रहण नहीं किया, वे केवल वायु का सेवन कर रहते थे।

गोसेवा पर प्रकाश डालते हुए कथा व्यास ने कहा कि गाय को केवल घर में स्थान देना ही पर्याप्त नहीं है, उसे अपने मन में भी बसाना होगा। आज गाय हमारे घरों से निकल गई, खेतों से निकल गई और अब हमारे हृदय से भी निकल गई है। इसी कारण गोरक्षा का प्रश्न खड़ा हो रहा है। उन्होंने कहा कि हमारा नियम है कि हम उसी घर में जाएंगे, जिस घर में गाय होगी। इस नियम के कारण हजारों घरों में गोसेवा प्रारंभ हुई है। यदि देश के सभी साधु-संत यह संकल्प लें कि वे उसी घर में जाएंगे, जहां गोसेवा होती है, तो गोरक्षा अपने आप साकार होने लगेगी। उन्होंने कहा कि वह दिन भारत का सौभाग्य होगा, जब देश के प्रत्येक मंत्री, सचिव और अधिकारी के घर में गाय की सेवा होने लगेगी।

भागवत कथा मृत्यु के भय को समाप्त करती है

कथा व्यास ने कहा कि भगवान की माया इतनी विचित्र है कि मनुष्य प्रतिदिन किसी न किसी को मृत्यु को प्राप्त होते देखता है, फिर भी स्वयं को अमर मानकर भगवान के बजाय सांसारिक पदार्थों में लगा रहता है। जो लोग संसार की उपलब्धियों पर हंस रहे हैं, उन्हें अनंत काल तक रोना पड़ सकता है, लेकिन जिसने भगवान के लिए रो लिया, उसका मरना भी मरण-महोत्सव बन जाता है।

सिद्ध संतों के कारण भारतवर्ष की आध्यात्मिक परंपरा सुरक्षित

उन्होंने कहा कि भारत में ऐसी अनेक गौरवशाली परंपराएं रही हैं, जहां संतों ने जीवित समाधि ली। जीवित समाधि वही ले सकता है, जिसके भीतर शरीर और संसार के प्रति ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव समाप्त हो गया हो। इन्हीं सिद्ध संतों के कारण भारतवर्ष की आध्यात्मिक परंपरा सुरक्षित है। मृत्यु उसी की होती है, जिसमें ‘मैं-मेरा’ और देहात्मभाव रहता है। जिसमें देहात्मभाव समाप्त हो जाता है, वह अमर हो जाता है।

स्वामी जी ने कहा कि जीव ईश्वर का अंश है, लेकिन माया के वशीभूत होकर सांसारिक बन जाता है। श्रीमद्भागवत हमें मृत्यु को समझना सिखाती है और हमारे भीतर मृत्यु के भय को समाप्त करती है। कथा व्यास ने कहा कि मृत्यु से भयभीत होने के बजाय जीवन को ऐसा बनाना चाहिए कि मृत्यु भी महोत्सव बन जाए। अंत समय में यदि नारायण की स्मृति आ जाए तो मृत्यु भी मंगलमय हो जाती है। यदि कोई भक्त जीवनभर भगवान का भजन करता रहा, लेकिन अंत समय में कोमा अथवा वात-पित्त-कफ आदि से व्याकुल होने के कारण भगवान को याद न कर पाए, तो भगवान स्वयं उसका स्मरण कर उसका कल्याण करते हैं।

संत का संकल्प जीव के कल्याण का आधार

अजामिल की कथा का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि यदि किसी संत ने किसी जीव के कल्याण का संकल्प कर लिया है तो उसका कल्याण अवश्य होता है। संतों ने अजामिल के कल्याण का संकल्प लेकर उसके पुत्र का नाम नारायण रखा था। पुत्र को पुकारते समय नारायण नाम का उच्चारण होने से ही अजामिल का कल्याण हो गया। उन्होंने कहा कि सभी साधनों का सार यही है कि जीवन के अंत समय में नारायण की स्मृति बनी रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

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