गंगा-गोमती क्षेत्र के भूजल में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रदूषण पर बीबीएयू करेगा महत्वपूर्ण शोध

WhatsApp Channel Join Now
गंगा-गोमती क्षेत्र के भूजल में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रदूषण पर बीबीएयू करेगा महत्वपूर्ण शोध


गंगा-गोमती क्षेत्र के भूजल में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रदूषण पर बीबीएयू करेगा महत्वपूर्ण शोध


- प्रो. नरेन्द्र कुमार एवं डॉ. मोनिका को एएनआरएफ से मिली शोध परियोजना

लखनऊ, 29 जून (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. नरेन्द्र कुमार तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग की डॉ. मोनिका को एक महत्वपूर्ण शोध उपलब्धि प्राप्त हुई है। अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) नई दिल्ली ने उनकी संयुक्त शोध परियोजना “गंगा-गोमती दोआब में आर्सेनिक और फ्लोराइड की हाइड्रोलॉजिकल मैपिंग: सह-घटना, पर्यावरणीय गतिशीलता और टिकाऊ न्यूनीकरण विधियों पर एक एकीकृत दृष्टिकोण” “(Hydrological Mapping of Arsenic and Fluoride in Ganga-Gomti Doab: An Integrated Approach on Co-occurrence, Environmental Dynamism and Sustainable Mitigation Methods)” को स्वीकृति प्रदान की है। लगभग 75 लाख रुपये की लागत वाली यह परियोजना तीन वर्षों की अवधि के लिए स्वीकृत की गई है।

यह जानकारी विश्वविद्यालय की जनसंपर्क अधिकारी डॉ. रचना गंगवार ओर से सोमवार को जारी पत्र में दी गई। बताया गया कि इस परियोजना का उद्देश्य उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण गंगा-गोमती दोआब क्षेत्र में भूजल में पाए जाने वाले दो प्रमुख प्रदूषकों आर्सेनिक और फ्लोराइड की स्थिति, वितरण, सह-अस्तित्व तथा उनके पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करना है। यह शोध क्षेत्र में सुरक्षित पेयजल उपलब्धता, जनस्वास्थ्य संरक्षण तथा पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बड़ी आबादी पेयजल के लिए भूजल पर निर्भर है, लेकिन हाल के वर्षों में भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की बढ़ती मात्रा गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरी है। ये तत्व प्राकृतिक रूप से चट्टानों और मिट्टी में पाए जाते हैं, किन्तु भूजल की बदलती परिस्थितियों, अत्यधिक दोहन तथा अन्य पर्यावरणीय कारकों के कारण इनकी सांद्रता बढ़ सकती है।आर्सेनिक एक अत्यंत विषैला तत्व है, जिसके दीर्घकालिक संपर्क से त्वचा संबंधी रोग, हृदय संबंधी समस्याएं तथा कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। वहीं फ्लोराइड की अधिक मात्रा डेंटल फ्लोरोसिस एवं स्केलेटल फ्लोरोसिस जैसी समस्याओं का कारण बनती है। जब ये दोनों प्रदूषक एक साथ भूजल में उपस्थित होते हैं, तो मानव स्वास्थ्य, कृषि, मिट्टी की गुणवत्ता और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर इनके प्रभाव और अधिक गंभीर हो जाते हैं।

परियोजना के अंतर्गत प्रभावित क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्रण, प्रदूषण के स्रोतों एवं कारणों की पहचान, भूजल की गतिशीलता का अध्ययन तथा व्यावहारिक एवं टिकाऊ शमन उपाय विकसित किए जाएंगे। शोध से प्राप्त निष्कर्ष नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को सुरक्षित पेयजल प्रबंधन तथा जनस्वास्थ्य संरक्षण के लिए उपयोगी वैज्ञानिक आधार प्रदान करेंगे।

यह परियोजना गंगा-गोमती क्षेत्र में जल गुणवत्ता सुधार, पर्यावरण संरक्षण तथा सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी। साथ ही, यह स्थानीय समुदायों में जल गुणवत्ता के प्रति जागरूकता बढ़ाने और जलजनित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मोहित वर्मा

Share this story