कृषि वैज्ञानिक बोले, कृषि में सूक्ष्म जीवों की भूमिका बन चुकी है एक परिष्कृत विज्ञान

कृषि वैज्ञानिक बोले, कृषि में सूक्ष्म जीवों की भूमिका बन चुकी है एक परिष्कृत विज्ञान
कृषि वैज्ञानिक बोले, कृषि में सूक्ष्म जीवों की भूमिका बन चुकी है एक परिष्कृत विज्ञान


-कृषि में सूक्ष्म जीव अनुसंधान के क्षितिज का विस्तार विषयक गोष्टी में शामिल हुए देश भर के वैज्ञानिक

तकनीक ने शोधकर्ताओं को पौधों और सूक्ष्मजीवों के बीच संवाद को समझने में दी नई पहुंच: डॉ तिलकराज

मऊ, 10 जून (हि.स.)। सूक्ष्मजीवों के उपयोग से कृषि उत्पादन को बढ़ाने और मिट्टी की सेहत को बनाए रखने में काफी सहयोग प्राप्त होता है। आज कृषि में सूक्ष्म जीवों की भूमिका एक परिष्कृत विज्ञान बन चुकी है। जिसमें विभिन्न उपयोग शामिल हैं। जैसे कीटों और रोग कारकों को नियंत्रित करना। बायो फ़र्टिलाइज़र के रूप में पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करना। पौधों की वृद्धि बढ़ाना।

कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत 19वीं शताब्दी के अंत में हुई थी,जब अमेरिकी शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया था कि स्वाभाविक रूप से संक्रमित मिट्टी को लैग्यूम के बीज के साथ मिलाने से उनकी वृद्धि में सुधार हो सकता है। तब से सूक्ष्मजीवों के कृषि में उपयोग की संभावना की पहचान की गई।

उपरोक्त बातें एनबीएआइएम के 32 वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने सोमवार को कही।

उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद स्थित राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव अनुसंधान संस्थान की स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि एवं फसल विज्ञान के उप महानिदेशक डॉक्टर तिलक राज शर्मा ने बताया कि हाल की प्रौद्योगिकीकरण उन्नतियां जैसे अगली पीढ़ी की सिक्वेसिंग ने पौधे संबंध माइक्रोबायोम के संरचना और कार्य की गहरी समझ प्रदान की है। इन तकनीक ने शोधकर्ताओं को पौधों और सूक्ष्म जीवों के बीच संवाद को समझने में नई पहुंच दी है। जिससे फसल उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है।

उन्होंने बताया कि इन तकनीक ने वैज्ञानिकों को माइक्रोबायोम की संरचना व कार्य में जीवाणुओं की भूमिका का अध्ययन करने की अधिक समझ प्रदान की है। कृषि विज्ञान में सूक्ष्मजीवों के उन्नत विकास के रूप में सिंथेटिक जीव विज्ञान व जीन इंजीनियरिंग का उदय हुआ है। इन प्रौद्योगिकियों से शोधकर्ताओं को विशेष गुणों वाले जीवाणुओं को बनाने या संशोधित करने की संभावना होती है। हालांकि उन्नतियों के साथ सावधानियों की आवश्यकता है और पर्यावरण प्रभाव का ध्यान भी रखना आवश्यक है।

दो दिवसीय इस सम्मेलन का उद्घाटन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक फसल विज्ञान डॉक्टर तिलक राज शर्मा ने किया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉक्टर सुरेश चौधरी उप महानिदेशक प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन व डॉक्टर प्रवीण कुमार चक्रवर्ती रहे।

सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ अमरनाथ मुखोपाध्याय पूर्व कुलपति असम कृषि विश्वविद्यालय ने किया। ब्यूरो निदेशक डॉक्टर आलोक कुमार श्रीवास्तव ने सम्मेलन आयोजन के आवश्यकताओं व महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहाकि सुख कृषि में सूक्ष्म जीवों के नवाचार फसल उत्पादन को बढ़ाने, रासायनिक इनपुट को कम करने और पर्यावरण संतुलन को प्रोत्साहित करने का वादा करते हैं। एक संतुलित दृष्टिकोण अपना कर और उन्नत मेटा-ओमिक्स और सिंथेटिक बायोलॉजी उपकरणों का उपयोग करके शोधकर्ता कृषि परिस्थितियों की जटिलताओं के साथ लगे जीवाणु तकनीक का विकास कर सकते हैं। जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सतत और सुरक्षित खाद्य प्रणाली सुनिश्चित हो सकेगी।

सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से 300 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। जिसमें विभिन्न विश्वविद्यालय के कुलपति, शोध संस्थाओं के निदेशक,महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर,प्रधान वैज्ञानिक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और शोधकर्ता शामिल रहे। सम्मेलन में एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया, जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 11 संस्थान और 16 कंपनियों ने सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकियों और उत्पादों का प्रदर्शन किया। आगंतुकों का स्वागत डॉक्टर हर्षवर्धन और धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर उदयभान सिंह ने किया।

हिन्दुस्थान समाचार/वेद नारायण/राजेश

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