कल्कि अवतार, धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प :  स्वामी मुक्तिनाथानंद

WhatsApp Channel Join Now
कल्कि अवतार, धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प :  स्वामी मुक्तिनाथानंद


लखनऊ, 03 मई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राम कृष्ण वचनामृत पर रविवार को अपने प्रवचन में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि सनातन धर्म के अनुसार, भगवान विष्णु ने अब तक नौ अवतार लिए हैं और दसवाँ अवतार 'कल्कि' अभी होना शेष है। कल्कि को युगावतार, अंतिम अवतार और धर्म-संस्थापक कहा गया है। भागवत पुराण, विष्णु पुराण और कल्कि पुराण में इनके अवतरण का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह अवतार केवल कथा नहीं, बल्कि कलियुग के अंत और सत्ययुग के आरंभ का आध्यात्मिक आश्वासन है।

उन्होंने कल्कि अवतार क्यों?, पर चर्चा करते हुए कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत'। जब-जब धर्म का ह्रास और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब भगवान अवतार लेते हैं। कलियुग की विशेषता है - असत्य, हिंसा, लोभ, कपट और स्वार्थ का बोलबाला है। पुराणों के अनुसार, कलियुग के अंतिम चरण में राजा प्रजा का शोषण करेंगे, धर्म केवल नाम का रह जाएगा, मनुष्य की आयु, स्मृति और शक्ति क्षीण हो जाएगी। चारों ओर अराजकता, भ्रष्टाचार और पाप का साम्राज्य होगा। तब मानवता को बचाने और धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए भगवान विष्णु 'कल्कि' रूप में प्रकट होंगे।

उन्होंने कल्कि अवतार कब और कहाँ होगा अवतरण?, के बारे में बताया कि कल्कि पुराण के अनुसार कलियुग के अंत में, जब पृथ्वी पर पाप अपने चरम पर होगा, तब संभल नामक ग्राम में विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर कल्कि का जन्म होगा। उनकी माता का नाम सुमति होगा। वे देवदत्त नामक श्वेत अश्व पर आरूढ़ होकर, हाथ में चमकती तलवार लेकर अधर्म का नाश करेंगे। उनका विवाह पद्मा से होगा, जो लक्ष्मी का अवतार होंगी। यह समय आज से लगभग 4,27,000 वर्ष बाद बताया गया है, क्योंकि कलियुग की कुल आयु 4,32,000 वर्ष है और अभी केवल 5,000 वर्ष ही बीते हैं। कल्कि को 'निष्कलंक' अवतार कहा गया है-जिसमें कोई कलंक, कोई दोष नहीं होगा। वे राजा नहीं, धर्म-रक्षक योद्धा होंगे।

पुराणों के अनुसार वे म्लेच्छों, दुराचारियों और अधर्मियों का संहार करेंगे। उनके पास आठ ऐश्वर्य और आठ सिद्धियाँ होंगी। वे केवल हिंसा से नहीं, बल्कि ज्ञान और धर्म के प्रकाश से भी अज्ञान का नाश करेंगे। उनके नेतृत्व में सत्य, तप, पवित्रता और दया फिर से प्रतिष्ठित होगी। उनके बाद सत्ययुग का प्रारंभ होगा, जहाँ लोग पुनः धर्म, वेद और ईश्वर में श्रद्धा रखेंगे।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि कल्कि अवतार का आध्यात्मिक संदेश यह है कि कल्कि अवतार केवल भविष्य की घटना नहीं, वर्तमान के लिए चेतावनी भी है। जब हमारे भीतर क्रोध, लोभ, अहंकार रूपी 'अधर्मी' प्रबल हो जाएँ, तब हमें अपने हृदय में 'कल्कि' को जगाना होता है। विवेक की तलवार से हमें अपने दुर्गुणों का नाश करना है। बाहरी कल्कि की प्रतीक्षा के साथ-साथ भीतरी कल्कि को जगाना ही सच्ची साधना है। तुलसीदास जी कहते हैं—'कलि केवल मल मूल मलीना'। कलियुग में केवल हरिनाम ही आधार है।

उन्होंने निष्कर्ष रूप में बताया कि कल्कि अवतार निराशा नहीं, आशा का प्रतीक है। वह बताता है कि चाहे अंधकार कितना भी गहरा हो, धर्म का सूर्य फिर उदित होगा। जब तक समाज में एक भी व्यक्ति सत्य और धर्म पर अडिग है, तब तक कल्कि की शक्ति कार्य कर रही है। हमें अधर्म से लड़ना है, पर घृणा से नहीं—धर्म और प्रेम से। कल्कि का वास्तविक इंतजार है—खुद को इतना शुद्ध बनाना कि जब वे आएँ, तो हम उनकी सेना में खड़े होने योग्य हों। तब तक 'हरे राम हरे कृष्ण' ही कलियुग का सबसे बड़ा शस्त्र है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मोहित वर्मा

Share this story