उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करने के प्रस्ताव का उक्रांद ने किया विरोध

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उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करने के प्रस्ताव का उक्रांद ने किया विरोध


नैनीताल, 04 अगस्त (हि.स.)। उत्तराखंड क्रांति दल ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित किए जाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए राज्यपाल को ज्ञापन भेजा है। दल का कहना है कि राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी राज्य निर्माण की मूल अवधारणाएं पूरी नहीं हो सकी हैं। इसके विपरीत उच्च न्यायालय के स्थानांतरण से पर्वतीय क्षेत्रों की संस्थागत उपेक्षा बढ़ने के साथ स्थानीय जनता में असंतोष पैदा होगा।

उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती एवं पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष नैनीताल के पूर्व विधायक डॉ. नारायण सिंह जंतवाल के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने लोकभवन देहरादून में राज्यपाल के प्रमुख सचिव रविनाथ रमन को ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 15 जुलाई 2026 को हाई कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम उत्तराखंड राज्य एवं अन्य मामले में दिए गए आदेश का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उच्च न्यायालय के स्थानांतरण का प्रश्न न्यायिक नहीं, बल्कि कार्यपालिका के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र का विषय है। यदि नैनीताल में आधारभूत सुविधाओं की कोई समस्या है तो उसका समाधान राज्य सरकार के परामर्श से प्रशासनिक स्तर पर किया जा सकता है, पूरी पीठ का स्थानांतरण उचित नहीं है।

ज्ञापन में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 26(2) का हवाला देते हुए कहा गया है कि तीन नवंबर 2000 को राष्ट्रपति की अधिसूचना के माध्यम से उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ नैनीताल में स्थापित की गई थी। ऐसे में उसके स्थान से संबंधित किसी भी प्रस्ताव पर संसद द्वारा बनाए गए विधिक प्रावधानों के अनुरूप ही विचार किया जा सकता है। दल का कहना है कि बिना वैधानिक प्रक्रिया और जनभावनाओं को ध्यान में रखे इस दिशा में आगे बढ़ना उचित नहीं होगा।

उक्रांद ने कहा कि पिछले ढाई दशकों से उच्च न्यायालय नैनीताल और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों की आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियों का प्रमुख आधार रहा है। इसके स्थानांतरण से अधिवक्ताओं, कर्मचारियों, व्यापारियों, परिवहन और पर्यटन एवं आतिथ्य व्यवसाय से जुड़े हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित होगी। दल ने राज्यपाल से अनुरोध किया है कि राज्य सरकार के किसी भी ऐसे प्रस्ताव को स्वीकृति न दी जाए, उसे पुनर्विचार के लिए मंत्रिपरिषद को लौटाया जाए तथा पूरे मामले को राष्ट्रपति एवं केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के समक्ष विचारार्थ भेजा जाए।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी

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