टीईटी की बाध्यता पर शिक्षकों में असंतोष, मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
देहरादून, 19 अगस्त (हि.स.)। अनुसूचित जाति–जनजाति शिक्षक एसोसिएशन उत्तराखंड ने सेवारत शिक्षकों पर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी)की बाध्यता को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री को विधिक व संवैधानिक आधारों पर ज्ञापन भेजा है। संगठन ने सरकार से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए वर्षों से राजकीय सेवा में कार्यरत शिक्षकों को अनावश्यक रूप से उत्पन्न हो रही सेवा संबंधी कठिनाइयों से राहत देने की मांग की है।
प्रदेश अध्यक्ष जगदीश राठी ने कहा कि वर्ष 2011 से पूर्व तत्कालीन सेवा नियमों व निर्धारित अर्हताओं के आधार पर विधिवत चयनित और नियुक्त प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षकों ने लंबे समय से राजकीय सेवा में रहते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन किया है। ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति के समय टीईटी को अनिवार्य पात्रता के रूप में लागू नहीं किया गया था। ऐसे में वर्षों की सेवा के बाद उन पर नई शर्त को लागू किया जाना शिक्षकों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। संगठन ने मांग की है कि ऐसे सभी सेवारत शिक्षकों को स्थायी रूप से TET की अनिवार्यता से मुक्त किया जाए तथा इस संबंध में स्पष्ट शासनादेश जारी किया जाए।
एसोसिएशन ने माध्यमिक शिक्षा में कार्यरत टीईटी (सहायक अध्यापक) शिक्षकों पर टीईटी द्वितीय की अनिवार्यता को लेकर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि एलटी संवर्ग की मूल नियुक्ति एवं कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से माध्यमिक स्तर की कक्षाओं, विशेषकर कक्षा 9 एवं 10, से संबंधित है, जबकि टीईटी द्वितीय की पात्रता का संबंध कक्षा 6 से 8 तक के अध्यापन से है। ऐसे में माध्यमिक स्तर पर कार्यरत शिक्षकों पर टीईटी- द्वितीय की अनिवार्यता लागू करने के औचित्य पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है।
प्रदेश अध्यक्ष जगदीश राठी ने कहा कि एसोसिएशन ने विशेष रूप से 12 अगस्त 2026 को निदेशालय स्तर से जारी आदेश पर तत्काल रोक लगाने तव उसके प्रभाव से उत्पन्न स्थिति की समीक्षा करने की मांग की है। संगठन ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि सेवारत शिक्षकों के बीच उत्पन्न भ्रम और असमंजस समाप्त हो सके।
संगठन ने यह भी मांग की है कि सरकार इस विषय पर शिक्षकों के प्रतिनिधिमंडल के साथ वार्ता कर उनकी वास्तविक समस्याओं को सुने तथा विधिक एवं संवैधानिक पहलुओं का परीक्षण कराने के बाद ऐसा स्पष्ट शासनादेश जारी करे, जिससे लंबे समय से राजकीय सेवा में कार्यरत शिक्षकों के हित सुरक्षित रह सकें।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ विनोद पोखरियाल

