वैज्ञानिक प्रसंस्करण से आजीविका के नए अवसर तलाशने पर जोर
हल्द्वानी, 01 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तराखंड के पर्वतीय और स्वदेशी समुदायों के लिए स्थानीय जैव-संसाधनों के सतत उपयोग, मूल्य संवर्धन और आजीविका के वैकल्पिक अवसर विकसित करने के उद्देश्य से जंगली गुलाब के फलों (रोज हिप्स) के सतत कटाई-पश्चात प्रसंस्करण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग, स्कूल ऑफ साइंस की ओर से विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम यूकॉस्ट, देहरादून द्वारा वित्तपोषित परियोजना के तहत हुआ। इसमें चंपावत और पिथौरागढ़ के प्रगतिशील किसानों, समुदाय प्रतिनिधियों और विषय विशेषज्ञों ने भाग लिया।
परियोजना अन्वेषक डॉ. एसएन ओझा ने रोज हिप्स के वैज्ञानिक संग्रहण, कटाई-पश्चात प्रबंधन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की संभावनाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध स्थानीय जैव-संसाधनों के वैज्ञानिक और सतत उपयोग से समुदायों के लिए अतिरिक्त आजीविका के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के हिमाचल क्षेत्रीय केंद्र, मोहाल-कुल्लू की वैज्ञानिक-ई डॉ. सरला शाशनी ने ऑनलाइन व्याख्यान में रोज हिप्स के सतत संग्रहण, उचित समय पर कटाई, प्राथमिक प्रसंस्करण, गुणवत्ता संरक्षण और भंडारण की तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर दिया।
सह-परियोजना अन्वेषक एवं अभिलाषा समिति, पिथौरागढ़ के निदेशक किशोर कुमार पंत ने स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग को ग्रामीण आजीविका से जोड़ने की आवश्यकता बताई। डॉ. विशाल कुमार शर्मा समेत अन्य विशेषज्ञों ने भी ऑनलाइन सहभागिता की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेश मठपाल, रिसर्च एसोसिएट, यूकॉस्ट कैंप कार्यालय, खर्ककार्की, चंपावत ने किया। प्रशिक्षण में रोज हिप्स के सतत संग्रहण से लेकर कटाई-पश्चात प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और संभावित औद्योगिक उपयोग तक विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।
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हिन्दुस्थान समाचार / अनुपम गुप्ता

