भारतीय वन्यजीव संस्थान की 37वीं वार्षिक अनुसंधान संगोष्ठी शुरू
देहरादून, 21 सितंबर (हि.स.)। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के देहरादून परिसर में सोमवार को 37वीं वार्षिक अनुसंधान संगोष्ठी-2026 का शुभारंभ हुआ। दो दिवसीय संगोष्ठी में वन्यजीव विज्ञान, जैव विविधता संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े अनुसंधानों पर देशभर के शोधकर्ता, वैज्ञानिक, वन्यजीव विशेषज्ञ, शिक्षाविद और संरक्षण विशेषज्ञ मंथन कर रहे हैं।मुख्य अतिथि इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव ने वन्यजीव संरक्षण को विकसित भारत-2047 के विजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण और अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भविष्य की भूमिका पर भी जोर दिया।
डब्ल्यूआईआई की डीन डॉ. रुचि बडोला ने बताया कि संस्थान के वैज्ञानिकों ने पिछले एक वर्ष में दो नई प्रजातियों, बुश फ्रॉग की 13 नई प्रजातियों और भारत में पहली मड-नेस्टिंग मेंढक प्रजाति की खोज की है। उन्होंने कहा कि संस्थान विकसित भारत-2047 के लिए वन्यजीव विजन प्लान तैयार करने की दिशा में भी कार्य कर रहा है।
उद्घाटन सत्र में वन्यजीव अनुसंधान और संरक्षण से संबंधित पांच प्रकाशनों का विमोचन किया गया। इनमें रामगंगा कैचमेंट के टाइगर बीटल्स, पूर्वोत्तर भारत में क्लाउडेड लेपर्ड तथा निकोबार मेगापोड जैसी प्रजातियों से संबंधित प्रकाशन शामिल हैं।
डब्ल्यूआईआई के निदेशक डॉ. जी.एस. भारद्वाज ने कहा कि संगोष्ठी शोधकर्ताओं और संकाय सदस्यों को अपने अनुसंधान प्रस्तुत करने तथा विशेषज्ञों से सुझाव प्राप्त करने का मंच उपलब्ध कराती है। उन्होंने कहा कि संस्थान का अधिकांश शोध क्षेत्र आधारित और कार्यान्वयन योग्य है, जिससे जमीनी स्तर पर वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियों का समाधान किया जा सके।
संगोष्ठी में मानव-वन्यजीव संघर्ष, आवास क्षरण, जैव विविधता, लैंडस्केप परिवर्तन, प्रजातियों की आबादी, संरक्षण और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व समेत विभिन्न विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इस दौरान वन्यजीव अनुसंधान में सहयोग के लिए भारतीय नौसेना और वायु सेना के अधिकारियों को भी सम्मानित किया गया।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय

