राष्ट्रीय पशु दिवस : बाघ संरक्षण देश और प्रकृति की सुरक्षा का राष्ट्रीय दायित्व : डॉ. खैरा

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राष्ट्रीय पशु दिवस : बाघ संरक्षण देश और प्रकृति की सुरक्षा का राष्ट्रीय दायित्व : डॉ. खैरा


देहरादून, 29 जुलाई (हि.स.)। राष्ट्रीय पशु दिवस के अवसर पर दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से स्कूली विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए भारत का राष्ट्रीय पशु : बंगाल टाइगर का संरक्षण और हमारी जिम्मेदारी विषय पर विशेष शैक्षिक एवं जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों को चित्रात्मक माध्यम से बाघ संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दी गईं।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भूगोलवेत्ता डॉ. सुरजीत सिंह खैरा ने कहा कि बंगाल टाइगर केवल भारत का राष्ट्रीय पशु नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक समृद्धि, शक्ति और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय साहित्य, लोककथाओं, कला और ऐतिहासिक अभिलेखों में बाघ का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त पुरावशेषों में भी बाघ की आकृतियाँ मिलती हैं, जो भारतीय संस्कृति से उसके प्राचीन संबंधों को दर्शाती हैं।

डॉ. खैरा ने कहा कि बाघ वन पारिस्थितिकी तंत्र का शीर्ष शिकारी (एपेक्स प्रीडेटर) है और इसकी उपस्थिति स्वस्थ वनों का संकेत मानी जाती है। उन्होंने बताया कि विश्व के आधे से अधिक जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं, इसलिए उनके संरक्षण की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी भारत पर है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1972 में बाघों की संख्या घटकर लगभग दो हजार रह जाने के बाद भारत सरकार ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 लागू किया तथा वर्ष 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में प्रोजेक्ट टाइगर प्रारम्भ किया गया। इन प्रयासों का परिणाम है कि आज भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 3,682 तक पहुँच चुकी है, जो विश्व स्तर पर संरक्षण की उल्लेखनीय सफलता मानी जाती है।

डॉ. खैरा ने विद्यार्थियों से कहा कि आज भी बाघों के सामने अवैध शिकार, वनों का विनाश, प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना, मानव-वन्यजीव संघर्ष तथा अवैध वन्यजीव व्यापार जैसी गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं। यदि वन सुरक्षित रहेंगे तो बाघ सुरक्षित रहेंगे, और यदि बाघ सुरक्षित रहेंगे तो संपूर्ण वन पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता तथा जल स्रोत भी सुरक्षित रहेंगे।

वार्ता में उन्होंने विद्यार्थियों से प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने, वन्यजीवों के संरक्षण का संदेश समाज तक पहुँचाने तथा पर्यावरण संरक्षण को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने की अपील भी की। इस अवसर पर उन्होंने दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की भूमिका का उल्लेख भी किया।

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि आज के समय में केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को प्रकृति, पर्यावरण, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन तथा वन्यजीव संरक्षण जैसे समसामयिक विषयों की व्यावहारिक समझ देना अत्यंत आवश्यक है। दून पुस्तकालय इसी उद्देश्य से विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों एवं विषय विशेषज्ञों को विद्यार्थियों के बीच आमंत्रित कर उन्हें प्रत्यक्ष संवाद का अवसर उपलब्ध कराता है, जिससे उनकी जिज्ञासाओं का समाधान हो सके और उनका ज्ञान अधिक व्यापक एवं व्यवहारिक बन सके।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने बाघ संरक्षण, राष्ट्रीय उद्यानों, टाइगर रिजर्व, वन्यजीव संरक्षण कानून तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कुछ प्रश्न भी पूछे, जिनका डॉ. खैरा ने सरल एवं वैज्ञानिक ढंग से उत्तर दिया। इस संवादात्मक सत्र ने विद्यार्थियों में विषय के प्रति विशेष उत्साह और रुचि उत्पन्न की।

कार्यक्रम में डॉ. सुरजीत सिंह खैरा ने कहा कि बाघों की रक्षा केवल एक वन्य जीव को बचाने का अभियान नहीं है, बल्कि भारत के वनों, जल स्रोतों, जैव विविधता, पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की रक्षा का राष्ट्रीय दायित्व है। उन्होंने सभी विद्यार्थियों से प्रकृति संरक्षण का संदेश अपने परिवार और समाज तक पहु़ंचाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के समापन पर दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भविष्य में भी स्कूली विद्यार्थियों के लिए इसी प्रकार के ज्ञानवर्धक, शोधपरक एवं जागरूकता आधारित कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाते रहेंगे, ताकि नई पीढ़ी ज्ञान, संवेदनशीलता और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ देश के सतत विकास में सार्थक भूमिका निभा सके।

कार्यक्रम में राजकीय बालिका इण्टर कालेज की छात्राएं तथा गुरुनानक एकेडमी स्कूल के छात्र /छात्राएं व उनकी अध्यापिकाएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहीं। इस शैक्षिक कार्यक्रम में, कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष, डी. के. पाण्डे, जय भगवान गोयल, सुंदर सिंह बिष्ट सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ विनोद पोखरियाल

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