‘अलकनंदा सुत’ जैसी कृतियां लिखी नहीं जातीं, वे पहाड़ की मिट्टी में उपजती हैं : डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

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‘अलकनंदा सुत’ जैसी कृतियां लिखी नहीं जातीं, वे पहाड़ की मिट्टी में उपजती हैं : डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’


उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण

देहरादून, 02 जनवरी (हि.स.)।

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से शुक्रवार को पुस्तकालय सभागार में समकालीन हिंदी साहित्य की चर्चित प्रवासी लेखिका अर्चना पैन्यूली के नवीन उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण एवं उस पर विचार–विमर्श कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस माैके पर वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित इस कृति में लेखिका ने भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं और जीवन के विविध पक्षों को सशक्त साहित्यिक अभिव्यक्ति दी है। उपन्यास का प्रकाशन वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया है।

‘अलकनंदा सुत’ जैसी कृतियां लिखी नहीं जातीं, वे पहाड़ की मिट्टी में उपजती हैं : डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कहा कि ‘अलकनंदा सुत’ जैसी कृतियां लिखी नहीं जातीं, बल्कि वे पहाड़ की मिट्टी में उपजती हैं और वहां की हवा, नदी और जनजीवन में रची-बसी होती हैं। उपन्यास का केंद्रीय पात्र शिवानंद गैरोला केवल एक चरित्र नहीं, बल्कि गढ़वाल की घाटियों में संघर्ष करते मानव मनोबल और जिजीविषा का प्रतीक है, जो थकता है, पर हार नहीं मानता।

‘अलकनंदा सुत’ मानव जीवन का एक प्रकार से विश्वकोश है

इस अवसर पर पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी ने कहा कि ‘अलकनंदा सुत’ मानव जीवन का एक प्रकार से विश्वकोश है। वरिष्ठ लेखिका सुधारानी पांडे ने इसे पहाड़ के जीवन-संघर्षों की संवेदनशील अभिव्यक्ति बताते हुए कहा कि अर्चना पैन्यूली प्रवासी जीवन में रहते हुए भी हिंदी साहित्य और उत्तराखंड के गौरव को जीवंत रखे हुए हैं।

पूर्व मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने कहा कि उपन्यास में पहाड़ी ग्रामीण परिवेश और वहां के संघर्षों का सजीव चित्रण देखने को मिलता है। कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि डेनमार्क में रहते हुए भी अर्चना पैन्यूली ने अपने साहित्य के माध्यम से हिंदी पाठकों को प्रवासी भारतीय जीवन और उत्तराखंड की आंचलिक विरासत से जोड़े रखा है। उन्होंने कहा कि यह कृति गढ़वाल की सांस्कृतिक परंपरा और कठिन पर्वतीय जीवन का सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत करती है। लेखिका अर्चना पैन्यूली ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा कि अपने मूल शहर देहरादून में साहित्यिक मित्रों, परिवार और पाठकों के बीच उपन्यास का लोकार्पण होना उनके लिए भावनात्मक और गौरवपूर्ण क्षण है।

उल्लेखनीय है कि अर्चना पैन्यूली वर्ष 1997 से डेनमार्क में निवास कर रही हैं और नॉर्थ सीलैंड इंटरनेशनल स्कूल से जुड़ी हैं। अब तक उनकी नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। डेनिश साहित्य की कई कृतियों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया है। उनका चर्चित उपन्यास ‘वेयर डू आई बिलांग’ तथा ‘कैराली मसाज पार्लर’ देश–विदेश में चर्चित रहा है।

कार्यक्रम के आरंभ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के निदेशक एन. रवि शंकर और कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक, पाठक और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार

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