पवित्र छड़ी यात्रा सात अक्टूबर से, चार धामों समेत उपेक्षित तीर्थ स्थलों का होगा भ्रमण
हरिद्वार, 26 अगस्त (हि.स.)। श्री पंच दशनाम जूना अखाड़े की ऐतिहासिक पवित्र छड़ी यात्रा इस वर्ष सात अक्टूबर से शुरू होगी। हरिद्वार स्थित अधिष्ठात्री देवी माया देवी मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद यात्रा का शुभारंभ किया जाएगा। करीब 24 दिन तक चलने वाली यह धार्मिक यात्रा 30 अक्टूबर तक उत्तराखंड के विभिन्न पौराणिक एवं धार्मिक स्थलों का भ्रमण करेगी।
यात्रा के दौरान चार धामों के साथ ही ऐसे अनेक प्राचीन और उपेक्षित तीर्थ स्थलों में भी पवित्र छड़ी का पूजन एवं दर्शन किया जाएगा, जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व व्यापक है, लेकिन वे अभी देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के बीच अपेक्षित रूप से प्रसिद्ध नहीं हैं।
जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने बताया कि पवित्र छड़ी यात्रा केवल चार धामों की यात्रा तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य उत्तराखंड की प्राचीन सनातन तीर्थ परंपरा, साधु-संतों की तपस्थली और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाना भी है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में सैकड़ों ऐसे पौराणिक तीर्थ स्थल हैं, जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मिलता है, लेकिन आधुनिक समय में इन स्थलों की जानकारी सीमित लोगों तक ही रह गई है। पवित्र छड़ी यात्रा के माध्यम से इन स्थलों को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर लाने का प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष यात्रा को मुख्य रूप से केदारखंड और मानसखंड दो प्रमुख खंडों में विभाजित किया गया है। केदारखंड में गढ़वाल मंडल के प्रमुख तीर्थ स्थलों का भ्रमण किया जाएगा, जबकि मानसखंड के अंतर्गत कुमाऊं मंडल के विभिन्न पौराणिक एवं सिद्धपीठों में पवित्र छड़ी पहुंचेगी। यात्रा के दौरान साधु-संतों और श्रद्धालुओं की ओर से संबंधित तीर्थ स्थलों पर पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और स्थानीय परंपराओं के अनुरूप कार्यक्रम किए जाएंगे।
श्रीमहंत हरि गिरि ने बताया कि यात्रा उत्तराखंड के दोनों मंडलों की धार्मिक विरासत को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करेगी। चार धामों—केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री—के अलावा विभिन्न प्राचीन मंदिरों, सिद्धपीठों, तपस्थलियों और अन्य धार्मिक स्थलों में भी पवित्र छड़ी का पूजन होगा। यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित ओम पर्वत और आदि कैलाश भी होगा। इससे सीमांत क्षेत्रों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को भी व्यापक पहचान मिलने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान केवल प्रसिद्ध चार धामों तक सीमित नहीं है। यहां कण-कण में धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं। कई तीर्थ स्थल ऐसे हैं जहां प्राचीन काल से साधु-संतों ने तपस्या की और धार्मिक साधना की। इन स्थलों को संरक्षित करने, इनके बारे में लोगों को जानकारी देने और श्रद्धालुओं को इनसे जोड़ने की आवश्यकता है।
जूना अखाड़े के संतों के अनुसार, पवित्र छड़ी यात्रा सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखती है। यात्रा के दौरान पवित्र छड़ी को विभिन्न तीर्थ स्थलों तक ले जाकर वहां पूजा-अर्चना की जाती है। अखाड़े के नागा संन्यासी और संत-महात्मा भी यात्रा में शामिल होते हैं। विभिन्न पड़ावों पर स्थानीय श्रद्धालु और धार्मिक संगठनों के लोग यात्रा का स्वागत करते हैं।
श्रीमहंत हरि गिरि ने कहा कि यात्रा के माध्यम से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ ही उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत को भी सामने लाया जाएगा। इससे पर्वतीय क्षेत्रों के छोटे और कम चर्चित तीर्थ स्थलों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने तथा स्थानीय स्तर पर धार्मिक पर्यटन से जुड़े रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।
उन्होंने कहा कि पवित्र छड़ी यात्रा का मूल उद्देश्य सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं को आगे बढ़ाना और उत्तराखंड की तीर्थ संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। यात्रा के माध्यम से देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं को चार धामों के साथ ही उन प्राचीन तीर्थ स्थलों के दर्शन के लिए भी प्रेरित किया जाएगा, जो धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
जूना अखाड़े की ओर से यात्रा की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। यात्रा मार्ग, प्रमुख पड़ावों और विभिन्न तीर्थ स्थलों पर होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों को लेकर संतों और संबंधित लोगों के बीच समन्वय किया जा रहा है। सात अक्टूबर को माया देवी मंदिर से विधिवत शुभारंभ के बाद पवित्र छड़ी उत्तराखंड के विभिन्न धार्मिक स्थलों का भ्रमण करते हुए 30 अक्टूबर को यात्रा के निर्धारित समापन चरण में पहुंचेगी।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला

