होली से पलायन की पीड़ा को बयां करने के साथ देवस्थलों को बचाने की मुहिम
नैनीताल, 02 मार्च (हि.स.)। होली का पर्व जहां रंग और उमंग का प्रतीक है, वहीं पहाड़ के लिए यह अपनों से जुड़ने का माध्यम भी रहा है। होली-दीपावली जैसे त्योहारों पर वर्ष भर प्रवास पर रहने वाले लोग भी अपने गांवों को लौटते हैं, लेकिन पहाड़ के कुछ अभागे क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहां के लोग अब सुविधा सम्पन्न क्षेत्रों में ऐसे रच-बस गये हैं कि होली के त्योहार पर भी गांव नहीं लौटते।
ऐसे में पलायन की मार से सूने होते गांवों और मंदिरों के प्रति नई चिंता खड़ी हो गयी है। इस चिंता को पौड़ी गढ़वाल के नैनीडांडा क्षेत्र के होल्यार इन दिनों नैनीताल जनपद के रामनगर और आसपास के तराई क्षेत्रों में बस चुके प्रवासी पहाड़ियों के बीच घर-घर पहुंचकर होली गायन के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ने और देवस्थलों को बचाने का संदेश दे रहे हैं।
उनका कहना है कि वे लगभग 400 वर्ष पुराने अपनी रक्षक देवी मां बुंगीदेवी मंदिर के संरक्षण के लिए प्रवासियों से सहयोग की अपील कर रहे हैं। उनका कहना है कि पहले होली और रामलीला जैसे आयोजनों से एकत्र धन से गांव के सामुदायिक कार्य संपन्न होते थे, लेकिन अब अधिकांश घरों में ताले लटके हैं और आयोजनों की परंपरा कमजोर पड़ गई है।
रामनगर के पीरूमदारा क्षेत्र में बसे नैनी डांडा क्षेत्र के लोगों के बीच पारंपरिक अंदाज में होली उत्सव आयोजित किया जा रहा है। ढोल-नगाड़ों और कुमाउनी वाद्य यंत्रों की थाप पर युवा और बुजुर्ग झूमते नजर आ रहे हैं। महिलाएं होली के साथ झोड़ा और चांचरी गीतों पर नाचकर अपनी लोक संस्कृति को याद करने और बच्चों को लोकसंस्कृति से परिचित कराने का विशेष प्रयास कर रही हैं।
आयोजकों का कहना है कि ऐसे सांस्कृतिक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और समाज में एकता व भाईचारे को सुदृढ़ करने का माध्यम भी बनते हैं। उम्मीद करनी होगी कि यह मुहिम अपने उद्देश्य के प्रति देर-सबेर सफल होगी।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी

