चारधाम यात्रा :- जनमानस की मांगों पर फैसले से पूर्व दीर्घगामी परिणामों की समीक्षा जरुरी

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चारधाम यात्रा :- जनमानस की मांगों पर फैसले से पूर्व दीर्घगामी परिणामों की समीक्षा जरुरी


श्री बद्रीनाथ/केदारनाथ, 28 मई(हि.स.)।

इस बार चारधाम यात्रा आखिर क्यों अनियंत्रित हो रही है? केदारनाथ एवं बद्रीनाथ पहुँचने वाले सभी श्रद्धालुओं को क्या सुलभ व सुगम दर्शन हो पा रहे हैं? और सड़क चौड़ीकरण/ऑल वेदर रोड के बावजूद घंटो जाम मे फंसने वाले यात्रियों की पीढ़ा... चारों धामों के कपाट खुलने के एक माह बीतने के बाद भी आखिर यह सब पटरी पर क्यों नहीं आ पा रहा है.?

मैदानों मे गर्मी से बेहाल श्रद्धालु, पर्यटक पहाड़ों की ओर कूच कर रहे हैं, तीर्थाटन से ज्यादा पर्यटकों व रील बनाने के शौक़ीनों का जमावड़ा लग रहा है, व्यवस्था मे जुटे महकमें व्यवस्था बनाने मे रात दिन एक किए हुए हैं यहाँ तक कि पुलिस प्रशासन के सहयोग के लिए अर्द्धसैनिक बलों को भी मैदान मे उतारा गया है फिर भी कई कई बार यात्रा मार्गो पर जाम की समस्या से निजात नहीं मिल पा रही है।

इन सब समस्याओं के अन्य कारणों मे एक यह समझ आ रहा है कि धामों मे पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को क्षमता के विपरीत असीमित किए जाने का निर्णय, जिसका खामियाजा न केवल तीर्थ यात्री बल्कि यात्रा व्यवस्था मे जुटे तमाम महकमे व ब्यवसायी भी भुगत रहे हैं।

दरसअल यात्रियों की बढ़ती संख्या व सभी श्रद्धालुओं को बेहतर ब्यवस्था के उद्देश्य से गत वर्षों तक धामों मे क्षमता के अनुरूप सीमित संख्या मे श्रद्धालुओं को भेजा जा रहा था, इससे यात्रा पर निर्भर ब्यवसाइयों मे नाराजगी दिखी और सीमित यात्रियों की संख्या की बाध्यता को समाप्त करने के लिए आंदोलन का रास्ता भी अपनाना पड़ा, और सरकार के मुखिया ने भी आंदोलन को जायज ठहराते हुए सीमित यात्रियों की संख्या की बाध्यता को समाप्त करने का फरमान जारी कर दिया।

इससे हालात इतने खराब हो गए कि प्रतिदिन विशेषकर श्री केदारनाथ एवं बद्रीनाथ मे पंद्रह से तीस हजार तक श्रदालु पहुँच रहे हैं,, सीमित आवासीय ब्यवस्था, सीमित पार्किंग एवं सीमित दर्शनों का स्थान और असीमित यात्रियों की संख्या तो अव्यवस्था होना स्वाभाविक ही है। केदारनाथ धाम से तो कई श्रद्धालुओं को बिना दर्शनों के ही निराश होकर वापस लौटना पड़ रहा है, इसके अलावा जब रात्रि दो दो बजे तक वाहनों का जाम लग रहा है तो यात्री एडवांस बुकिंग वाले होटलों तक भी नहीं पहुँच पा रहे हैं।

इन सब स्थितियों से किसका फायदा व किसका नुकसान हो रहा है यह अलग पक्ष है लेकिन सबसे ज्यादा परेशान तो वह तीर्थयात्री हो रहा है जो वर्षो से दर्शनों की मुराद लेकर इन धामों तक पहुँच रहा है। यह स्थिति तब है जब कपाट खुलने से चार महीने पूर्व जनवरी महीने से ही चारधाम यात्रा की तैयारियां शुरू हो जाती है और चाक चौबंद जैसे शब्दों का तो कई बार इस्तेमाल भी होता है, लेकिन इस बार सभी व्यवस्थाएं धरातल पर ध्वस्त नजर आ रही है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शासन-प्रशासन के पास न केवल धामों बल्कि यात्रा मार्ग के हर स्टेशनों की आवास क्षमता, पार्किंग सुविधा, होटल, ढाबे, रेस्टोरेंट आदि की पुख्ता जानकारी है, इसके बावजूद धामों मे यदि क्षमता से अधिक यात्री पहुँच रहे हैं तो इससे अव्यवस्था तो होगी ही। इस पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए ताकि देवभूमि उत्तराखंड की अथिति देवोभवः की परंपरा धरातल पर भी दिखे और धामों मे पहुँचने वाले श्रदालु अच्छा अनुभव लेकर भी लौटें।

सरकारें जनता जनार्दन के हितों के लिए जबाबदेह अवश्य है किन्तु किसी भी निर्णय से पूर्व उसके दीर्घगामी परिणामों की समीक्षा तो होनी ही चाहिए।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रकाश कपरुवाण

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