प्राकृतिक खेती अपनाने से घटेगी लागत और बढ़ेगी किसान की आमदनी

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प्राकृतिक खेती अपनाने से घटेगी लागत और बढ़ेगी किसान की आमदनी


जयपुर, 08 अगस्त (हि.स.)। श्री कर्ण नरेंद्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर में को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, कृषि शिक्षा में सुधार, अनुसंधान सहयोग एवं कृषि विश्वविद्यालयों के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर एकदिवसीय राज्य स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों ने किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों, मृदा स्वास्थ्य, पोषक तत्व प्रबंधन, कृषि एवं पशुपालन के समन्वय तथा प्राकृतिक उत्पादों के प्रभावी विपणन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी दी। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृषि आयुक्त, राजस्थान नरेश कुमार गोयल रहे, जबकि अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर डॉ. पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने की।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं विश्वविद्यालय कुलगीत के साथ हुआ। मुख्य अतिथियों का पौधा भेंट कर एवं साफा पहनाकर पारंपरिक स्वागत किया गया। कृषि आयुक्त नरेश कुमार गोयल ने किसानों को केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न कृषि योजनाओं, नीतियों एवं अनुदान कार्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने के साथ सरकारी योजनाओं का अधिकाधिक लाभ लेने तथा प्राकृतिक उत्पादों के उत्पादन के साथ उनके बेहतर विपणन पर ध्यान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से खेती की लागत को नियंत्रित करने, मिट्टी की सेहत बनाए रखने और किसानों की आय बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं। इस दौरान उन्होंने उपस्थित किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने का संकल्प भी दिलाया।

अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रोफेसर डॉ. पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए प्राकृतिक उत्पादों के वैज्ञानिक परीक्षण, प्रमाणन एवं प्रभावी विपणन की मजबूत व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण प्राकृतिक उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध होने से किसानों को उचित मूल्य एवं आय के नए अवसर मिल सकते हैं।

कुलगुरु डॉ पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने विद्यार्थियों के लिए प्राकृतिक उत्पादों के विपणन, ब्रांडिंग एवं विज्ञापन के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए किसानों और युवाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय किसानों के हितों एवं कृषि विकास के लिए निरंतर कार्य करता रहेगा।

इस अवसर पर अतिथियों ने महाविद्यालय द्वारा प्रकाशित मुद्रित साहित्य का विमोचन भी किया।

डॉ. जे.पी. मिश्रा, निदेशक, अटारी ने प्राकृतिक खेती के प्रमुख स्तंभ जीवामृत, बीजामृत एवं पलवार की उपयोगिता एवं प्रयोग की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने प्राकृतिक खेती को बाजारोन्मुख बनाने तथा इसे भारतीय कृषि संस्कृति एवं स्थानीय संसाधनों से जोड़ने पर बल दिया।

बीजीय मसाला अनुसंधान संस्थान, तबीजी, अजमेर के निदेशक डॉ. विनय भारद्वाज ने बीजीय मसालों के उत्पादन में सूक्ष्म पोषक तत्वों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने संतुलित पोषण को फसल उत्पादन का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए प्राकृतिक खेती को बेहतर स्वास्थ्य एवं टिकाऊ कृषि की दिशा में उपयोगी कदम बताया।

डॉ. संग्राम सिंह, पूर्व निदेशक, प्रसार शिक्षा ने कृषि एवं पशुपालन के एकीकृत विकास को किसानों की समृद्धि का आधार बताते हुए दोनों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि खेती के साथ पशुपालन को जोड़कर किसान अपनी आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित कर सकते हैं।

डॉ. ओ.पी. गढ़वाल ने रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरता में आ रही कमी पर चिंता जताई।

डॉ. कमलेश कुमार शर्मा ने कहा कि रासायनिक खेती के बढ़ते दुष्प्रभावों के कारण प्राकृतिक खेती समय की आवश्यकता बन गई है। उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट एवं हरित खाद के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर देते हुए कहा कि इनके प्रयोग से मिट्टी में आवश्यक सूक्ष्म एवं स्थूल पोषक तत्वों की पूर्ति होती है तथा भूमि की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिलती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश

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