न्यायिक सुधारों के लिए नैतिक साहस अनिवार्य: न्यायमूर्ति बिपिन गुप्ता

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न्यायिक सुधारों के लिए नैतिक साहस अनिवार्य: न्यायमूर्ति बिपिन गुप्ता


जयपुर, 12 जनवरी (हि.स.)। न्यायिक सुधारों को प्रभावी बनाने के लिए नैतिक साहस और आंतरिक दृढ़ता अत्यंत आवश्यक है। यह बात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बिपिन गुप्ता ने राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर अधिवक्ता परिषद राजस्थान के जयपुर प्रांत द्वारा आयोजित “न्यायिक सुधारों में युवाओं की भागीदारी” समारोह में कही। उन्होंने युवा अधिवक्ताओं से न्यायिक पेशे में चरित्र और सत्यनिष्ठा को आधार बनाने का आह्वान किया।

न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि तकनीकी और प्रक्रियात्मक सुधार तभी सार्थक सिद्ध होंगे, जब उनके पीछे अधिवक्ता का चरित्र मजबूत होगा। न्याय व्यवस्था की वास्तविक मजबूती बाहरी बदलावों से नहीं, बल्कि प्रत्येक अधिवक्ता के आंतरिक बल, नैतिकता और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता से तय होती है। उन्होंने युवा वकीलों से चुनौतियों का डटकर सामना करने और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आग्रह किया।

कार्यक्रम के अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रांत महामंत्री अभिषेक सिंह ने “न्याय मम धर्मः” को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि न्यायिक सुधार समाज की न्याय व्यवस्था में आस्था को मजबूत करने की प्रक्रिया है, जिसकी शुरुआत व्यक्तिगत आचरण से होती है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए युवाओं से व्यक्तिगत, सामूहिक और राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के क्षेत्रीय मंत्री कमल परसवाल ने न्यायिक व्यवस्था में सामूहिक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने “न्याय मम धर्मः” को जीवन-दर्शन बताते हुए कहा कि न्यायाधीश, अधिवक्ता और न्यायिक कर्मचारी यदि एकजुट होकर कार्य करें, तो न्याय व्यवस्था अधिक सुदृढ़ बन सकती है।

कार्यक्रम का संचालन मीनल भार्गव ने किया। विषय-प्रवर्तन रूपेंद्र सिंह राठौड़ तथा संगठन-परिचय अखिल दाधीच ने दिया। इकाई अध्यक्ष धर्मेंद्र जैन ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर उपाध्यक्ष सोनिया शांडिल्य, बार अध्यक्ष राजीव सोगरवाल और महामंत्री दीपेश शर्मा सहित अनेक अधिवक्ता उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / ईश्वर

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