धनी भाग्यशाली, स्वस्थ सौभाग्यशाली, पर धार्मिक जीवन जीने वाला महासौभाग्यशाली : ललितप्रभ

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धनी भाग्यशाली, स्वस्थ सौभाग्यशाली, पर धार्मिक जीवन जीने वाला महासौभाग्यशाली : ललितप्रभ


जोधपुर, 22 अगस्त (हि.स.)। संत ललितप्रभ ने कहा कि धर्म हमें आचरण को श्रेष्ठ और नैतिक बनाने की प्रेरणा देता है। धर्म को केवल परम्पराओं में बांधने की बजाय प्रेक्टिकल स्वरूप में जीने की कोशिश कीजिए। धर्म की हमें सिखावन है - अपने कर्तव्यों का पालन कीजिए, इंसान होकर इंसान के काम आइए, मनोविकारों पर विजय प्राप्त कीजिए और सब धर्मों का सम्मान कीजिए। उन्होंने कहा कि अंतरमन में त्याग, वैराग्य और संयम के प्रति श्रद्धा रखिए। अपने कषाय और मनोविकारों पर विजय प्राप्त कीजिए। अगर हम निर्मल कर्म और विचारों के मालिक बनते हैं, तो हमारा स्वरूप चलते-फिरते मंदिर जैसा ही होगा।

वे शनिवार को संबोधि धाम ट्रस्ट मंडल द्वारा गांधी मैदान, सरदारपुरा में आयोजित 53 दिवसीय चातुर्मास प्रवचनमाला के 28 वें दिन युवाओं को धर्म से जोडऩा क्यों जरूरी विषय पर हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। संतप्रवर ने कहा कि आप जिस धर्म के अनुयायी है, उसका आचरण कीजिए, पर अन्य धर्मों के प्रति भी प्रेम रखिए। इस दुनिया में प्रेम के मंदिर हों, प्यार के गिरजे हों और मोहब्बत की मस्जिदें बनें, तो धरती को स्वर्ग बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा हो जाएगी। अगर हम धर्म का ऐसा स्वरूप बनाते हैं, तो पूरी दुनिया धर्म का आचरण करने के प्रति स्वत: ही समर्पित हो जाएगी और यह धरती किसी भगवान का मंदिर और तीर्थ बन जाएगी।

उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि जिसके पास धन है वह भाग्यशाली, जिसके पास धन व स्वास्थ्य है वह सौभाग्यशाली, पर जिसके पास धन और स्वास्थ्य के साथ धर्म भी है वह है महासौभाग्यशाली।

संतप्रवर ने कहा कि धर्म दीवार नहीं द्वार है। धर्म के नाम पर मानव जाति को तोडऩा पाप है। धर्म का जन्म इंसानियत को जोडऩे के लिए हुआ है, तोडऩे के लिए नहीं। धर्म का संबंध केवल मंदिर, मस्जिद, सामायिक, पूजा-पाठ से नहीं, जीवन से है। जो चित्त को निर्मल और कषायों को कमकर जीवन को पवित्र करे वही सच्चा धर्म है। व्यक्ति खुद भी सुख से जिए और औरों के लिए भी सुख से जीने की व्यवस्था करे इसी में धर्म का सार छिपा हुआ है।

संतप्रवर ने कहा कि इंसान का दूसरा धर्म है भीतर पलने वाले विकारों पर विजय पाना। इंसान आकृति से ही नहीं, प्रकृति से भी इंसान बने। कमजोर और काले मन वाले कभी सच्चे धार्मिक नहीं बनते। उन्होंने कहा कि व्यक्ति केवल सीता की मूर्ति में ही सीता को न देखे, वरन सड़क चलती नारी में भी सीता माँ के दर्शन का सौभाग्य ले।

धर्म का जन्म इंसानियत को जोडने के लिए हुआ है, तोडने के लिए नहीं। धर्म का संबंध केवल मंदिर, मस्जिद, सामायिक, पूजा-पाठ से नहीं, जीवन से है। जो चित्त को निर्मल और कषायों को कमकर जीवन को पवित्र करे वही सच्चा धर्म है। व्यक्ति खुद भी सुख से जिए और औरों के लिए भी सुख से जीने की व्यवस्था करे इसी में धर्म का सार छिपा हुआ है। ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक पारख ने बताया कि रविवार को गांधी मैदान में विश्व स्तर पर चर्चित और लोकप्रिय प्रवचन सोचो, अगर मां न होती... का अद्भुत आयोजन होगा।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

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