विश्व थैलेसीमिया दिवस: समय पर जांच और बोन मैरो ट्रांसप्लांट से बच सकती हैं नन्हीं जिंदगियां
जयपुर, 07 मई (हि.स.)। विश्व थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने थैलेसीमिया के प्रति जागरूकता बढ़ाने और समय पर जांच कराने की आवश्यकता पर जोर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा तकनीकों और बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) की मदद से अब थैलेसीमिया का स्थायी उपचार संभव हो चुका है।
भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल के वरिष्ठ ब्लड कैंसर एवं बीएमटी विशेषज्ञ डॉ प्रकाश सिंह शेखावत ने बताया कि थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को हर 15 से 20 दिन में रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। लगातार रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन बढ़ जाता है, जिससे हृदय, लिवर और हार्मोन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट थैलेसीमिया का सबसे प्रभावी और स्थायी उपचार माना जाता है। इसमें खराब बोन मैरो को स्वस्थ स्टेम सेल्स से बदला जाता है, जिससे शरीर सामान्य रक्त बनाना शुरू कर देता है। भाई-बहन में मैचिंग डोनर मिलने पर सफलता दर अधिक रहती है, वहीं अब हैप्लो-आइडेंटिकल ट्रांसप्लांट तकनीक से परिवार के अन्य सदस्यों से भी ट्रांसप्लांट संभव हो रहा है। उन्होंने कहा कि कम उम्र में ट्रांसप्लांट बेहतर परिणाम देता है और सफल उपचार के बाद बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं। राजस्थान सरकार की मां योजना और केंद्र सरकार के कोल इंडिया प्रोग्राम के तहत थैलेसीमिया मरीजों का निशुल्क बीएमटी भी किया जा रहा है।
बीएमसीएच की बाल कैंसर एवं रक्त रोग विशेषज्ञ डॉ शिवानी माथुर ने बताया कि थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों में छह माह से एक वर्ष की उम्र में ही खून की कमी के लक्षण दिखने लगते हैं। इनमें अत्यधिक कमजोरी, चेहरा पीला पड़ना, बार-बार संक्रमण, भूख कम लगना, वजन और लंबाई का सही विकास नहीं होना, पेट फूलना और जल्दी थकान शामिल हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि यदि बच्चे में ऐसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत थैलेसीमिया जांच करानी चाहिए। उन्होंने विवाह पूर्व और गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया स्क्रीनिंग को भी जरूरी बताते हुए कहा कि यदि दोनों माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हों तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा 25 फीसदी तक रहता है। समय पर जांच और जेनेटिक काउंसलिंग से इस बीमारी की रोकथाम संभव है।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

