आयुर्वेद विवि में मनाया विश्व अल्जाइमर दिवस

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आयुर्वेद विवि में मनाया विश्व अल्जाइमर दिवस


आयुर्वेद विवि में मनाया विश्व अल्जाइमर दिवस


जोधपुर, 21 सितम्बर (हि.स.)। विश्व अल्जाइमर दिवस के अवसर पर राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय के पंचकर्म विभाग में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य आमजन को अल्जाइमर रोग एवं डिमेंशिया के प्रति जागरूक करना, इसके प्रारंभिक लक्षणों की पहचान, समय पर चिकित्सकीय परामर्श तथा रोगियों एवं उनके परिजनों की समग्र देखभाल के महत्व के बारे में जानकारी प्रदान करना रहा।

कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर (वैद्य) गोविन्द सहाय शुक्ल के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से किया गया। कार्यक्रम में पंचकर्म विभागाध्यक्ष डॉ. ज्ञान प्रकाश शर्मा के नेतृत्व में डॉ. दिलीप कुमार व्यास, डॉ. अचलाराम कुमावत एवं डॉ. गौरीशंकर राजपुरोहित उपस्थित रहे।

चिकित्सालय अधीक्षक प्रो. ए. नीलिमा की भी उपस्थिति रही। इस अवसर पर प्रो. डॉ. ज्ञानप्रकाश शर्मा ने अल्जाइमर रोग के प्रमुख लक्षण, कारण, जोखिम कारक एवं चिकित्सकीय प्रबंधन के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अल्जाइमर रोग में धीरे-धीरे स्मरण शक्ति में कमी, हाल की घटनाओं को भूलना, दैनिक कार्यों में कठिनाई, समय एवं स्थान को लेकर भ्रम, भाषा एवं निर्णय क्षमता में कमी तथा व्यवहार में परिवर्तन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। उन्होंने बताया कि बढ़ती उम्र अल्जाइमर रोग का एक प्रमुख जोखिम कारक है, हालांकि स्मृति में लगातार होने वाले असामान्य परिवर्तन को केवल उम्र बढऩे का सामान्य परिणाम नहीं मानना चाहिए। प्रारंभिक पहचान एवं चिकित्सकीय मूल्यांकन से रोगी की देखभाल एवं जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।

उन्होंने नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, सामाजिक एवं मानसिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी, उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह जैसे जोखिम कारकों के नियंत्रण तथा नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला। पी.जी. अध्येता डॉ. योगिता ने अल्जाइमर रोग के निदान, पूर्वरूप, लक्षण, आयुर्वेदिक दृष्टिकोण एवं समग्र प्रबंधन पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि आयुर्वेद में स्मृति, बुद्धि, मन एवं चेतना से संबंधित कार्यों को मन, हृदय तथा मज्जावह स्रोतस की अवधारणाओं के संदर्भ में समझा जा सकता है। अल्जाइमर जैसे रोगों में रोगी की आयु, प्रकृति, दोष-दूष्य, अग्नि, बल, मानसिक स्थिति एवं रोग की अवस्था को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत उपचार योजना बनाई जानी चाहिए।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

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