आईआईटी जोधपुर की अत्याधुनिक तकनीक से क्षतिग्रस्त पांडुलिपियों को पढऩे में मिलेगी मदद

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आईआईटी जोधपुर की अत्याधुनिक तकनीक से क्षतिग्रस्त पांडुलिपियों को पढऩे में मिलेगी मदद


जोधपुर, 03 नवम्बर (हि.स.)। भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा में छिपे गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन और विज्ञान से जुड़े ज्ञान को अब आधुनिक तकनीक की मदद से समझना आसान हो सकेगा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जोधपुर के शोधकर्ता कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की सहायता से ऐसी अत्याधुनिक प्रणाली विकसित कर रहे हैं, जो धुंधली, क्षतिग्रस्त और जटिल हस्तलेखन वाली प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों को पढऩे, समझने और संरक्षित करने में मदद करेगी। यह अनुसंधान भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोडऩे की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के सहायक प्राध्यापक डॉ. दिनेश मोहन जोशी के नेतृत्व में किए जा रहे इस अनुसंधान के तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुकूली पांडुलिपि प्रसंस्करण मंच विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य हजारों वर्ष पुरानी पांडुलिपियों में सुरक्षित ज्ञान को पुन: पठनीय बनाना और उसे शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, शिक्षाविदों तथा विद्यार्थियों के लिए अधिक सुलभ करना है।

भारत की पांडुलिपि विरासत में गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन, साहित्य, वास्तुकला और धातु विज्ञान सहित अनेक विषयों का विशाल ज्ञान भंडार मौजूद है। लेकिन समय के साथ स्याही का धुंधला पडऩा, पृष्ठों का फटना, अक्षरों का मिटना और शब्दों का एक-दूसरे पर चढ़ जाना इनके अध्ययन में बड़ी बाधाएं पैदा करता है। सामान्यत: साफ और मुद्रित दस्तावेजों को पढऩे के लिए विकसित पारंपरिक तकनीकें ऐसी ऐतिहासिक पांडुलिपियों को समझने में पर्याप्त प्रभावी नहीं होतीं।

इसी चुनौती के समाधान के लिए विकसित की जा रही प्रणाली पांडुलिपियों की छवियों में सुधार करने, अक्षरों और शब्दों की पहचान करने, भाषाई संरचना समझने तथा लिप्यंतरण और अनुवाद में सहायता करने पर केंद्रित है। इसके साथ ही मूल पांडुलिपि की प्रामाणिकता, स्रोत और संदर्भ को सुरक्षित रखने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

छह प्रमुख भारतीय लिपियों पर होगा काम

प्रस्तावित तकनीकी मंच को देवनागरी, शारदा, ग्रंथ, नंदिनागरी, मोड़ी और तुलु-तिगलारी सहित छह प्रमुख भारतीय लिपियों के अनुरूप विकसित किया जा रहा है। प्रत्येक लिपि की अपनी विशेषताएं और तकनीकी चुनौतियां हैं। कहीं संयुक्ताक्षरों की पहचान कठिन है, तो कहीं ऐतिहासिक अक्षर रूपों और प्रवाहपूर्ण हस्तलेखन को समझना चुनौतीपूर्ण होता है। इसी कारण सभी पांडुलिपियों पर एक जैसी प्रक्रिया लागू करने के बजाय उनकी लिपि, भाषा, लेखन शैली और भौतिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग तकनीकों का उपयोग किया जाएगा।

प्रणाली पांडुलिपि का प्रारंभिक विश्लेषण कर उसकी विशेषताओं के आधार पर उपयुक्त प्रक्रिया निर्धारित करेगी। आवश्यकता पडऩे पर किसी चरण को दोहराने, वैकल्पिक तकनीक अपनाने अथवा विशेषज्ञ विद्वान से परीक्षण कराने की व्यवस्था भी विकसित की जा रही है।

हस्तलिखित अक्षरों की पहचान होगी

अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हस्तलिखित पाठ पहचान तकनीक है। इसकी मदद से प्राचीन हस्तलेखन को पहचानकर मशीन द्वारा पढ़े जा सकने वाले यूनिकोड पाठ में बदला जा सकेगा। साथ ही, पहचाने गए पाठ की विश्वसनीयता का स्तर भी उपलब्ध कराने की योजना है, जिससे विशेषज्ञ उसकी जांच और पुष्टि कर सकेंगे। प्राचीन ग्रंथों में पुराने शब्द, वर्तनी के अलग-अलग रूप, विशिष्ट पारिभाषिक शब्द और जटिल व्याकरणिक संरचनाएं होती हैं। इसलिए केवल अक्षरों की पहचान पर्याप्त नहीं है। प्रस्तावित प्रणाली में पाठ का मानकीकरण, शब्द विभाजन, लिप्यंतरण, संदर्भ के आधार पर व्याख्या और आधुनिक भारतीय भाषाओं तथा अंग्रेजी में अनुवाद जैसी सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। इसका उद्देश्य विद्वानों के शोध कार्य में सहायता करना है, न कि उनकी विशेषज्ञता का स्थान लेना।

ब्रह्मगुप्त और सूर्यसिद्धांत से जुड़ी पांडुलिपियों का भी अध्ययन

तकनीकी अनुसंधान के साथ डॉ. जोशी भारतीय गणित और खगोलशास्त्र से संबंधित महत्वपूर्ण अप्रकाशित पांडुलिपियों के आलोचनात्मक अध्ययन एवं संपादन पर भी काम कर रहे हैं। इनमें सातवीं शताब्दी के गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त के ग्रंथ ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ पर दसवीं शताब्दी के विद्वान पृथुदकस्वामी की टीका का अध्ययन शामिल है। इसके अतिरिक्त, सोलहवीं शताब्दी के गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री विश्वनाथ की टीका सहित ‘सूर्यसिद्धांत’ पर भी कार्य किया जा रहा है। इन प्रयासों से आधुनिक संगणकीय तकनीकों और भारत की प्राचीन वैज्ञानिक परंपराओं के बीच महत्वपूर्ण शैक्षणिक संबंध स्थापित होने की संभावना है।

डॉ. दिनेश मोहन जोशी ने कहा कि भारत की पांडुलिपियों में हजारों वर्षों में विकसित असाधारण बौद्धिक ज्ञान सुरक्षित है, लेकिन उनकी भौतिक स्थिति और भाषाई जटिलताओं के कारण इसका बड़ा हिस्सा आज भी आसानी से उपलब्ध नहीं है। इस पहल के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पारंपरिक पांडुलिपि अध्ययन को जोडक़र इस चुनौती का समाधान करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उद्देश्य केवल पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण करना नहीं, बल्कि उनकी सामग्री को पुनर्स्थापित करने, पहचानने और समझने में सहायता देने वाली बुद्धिमान प्रणाली विकसित करना है।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

Livevns.news Desk
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