राजस्थान में बारिश मापने का कमजोर नेटवर्क, 150 से अधिक तहसीलें अब भी वर्षामापी यंत्रों से वंचित
जयपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। राजस्थान में मानसून के दौरान बारिश का सटीक आकलन और समय पर सूचना उपलब्ध कराने में मौसम विभाग का तंत्र अभी भी पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाया है। प्रदेश के कई तहसीलों, उप-तहसीलों और बांधों पर वर्षामापी यंत्र (रेनगेज) नहीं होने के कारण न केवल आमजन तक सही जानकारी नहीं पहुंच पा रही, बल्कि सरकार और प्रशासन भी कई क्षेत्रों में वास्तविक वर्षा के आंकड़ों से समय पर अनभिज्ञ रह जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और लगातार बदलते मौसम के दौर में मजबूत मौसम निगरानी नेटवर्क की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
जानकारी के अनुसार मौसम विभाग और जल संसाधन विभाग लगातार अपने नेटवर्क का विस्तार करने में जुटे हैं, लेकिन प्रदेश के विशाल भौगोलिक क्षेत्र की तुलना में उपलब्ध संसाधन अभी भी अपर्याप्त हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि कई ऐसे स्थान हैं जहां कार्यालय या स्थायी कर्मचारी नहीं होने के कारण वर्षामापी यंत्र स्थापित नहीं किए जा सके हैं। वहीं कई तहसील और उप-तहसील मुख्यालय आज भी इस सुविधा से वंचित हैं। राजस्थान में जल संसाधन विभाग द्वारा वर्तमान में 719 स्थानों पर वर्षामापी यंत्र लगाए गए हैं। प्रदेश में करीब 426 तहसीलें और 232 उप-तहसीलें हैं, जिनमें से लगभग 490 स्थानों पर ही वर्षामापी यंत्र उपलब्ध हैं। इसका मतलब है कि 150 से अधिक तहसील और उप-तहसील क्षेत्रों में अब भी वर्षा मापने की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में बारिश का आकलन आसपास के केंद्रों के आधार पर किया जाता है, जिससे कई बार वास्तविक आंकड़ों में अंतर आ जाता है।
बांधों की बात करें तो प्रदेश में छोटे-बड़े मिलाकर 693 बांध हैं, लेकिन इनमें से केवल करीब 210 बांधों पर ही वर्षामापी यंत्र स्थापित हैं। जबकि राजस्थान में 33 बड़े और 262 मध्यम बांध जल प्रबंधन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बांधों के जलग्रहण क्षेत्रों में सटीक वर्षा मापन नहीं होने से जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण जैसी योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।
मौसम विज्ञान केंद्र जयपुर के अनुसार विभाग ने पूरे प्रदेश में 50 ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन और 64 ऑटोमेटिक रेनगेज स्थापित किए हैं। जिला मुख्यालयों पर ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन लगाए गए हैं, जबकि कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में ऑटोमेटिक रेनगेज के माध्यम से वर्षा का डेटा एकत्र किया जाता है। हालांकि प्रदेश के हजारों गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों को देखते हुए यह संख्या अभी भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रदेश के सभी तहसील मुख्यालयों, प्रमुख बांधों और संवेदनशील ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक मौसम उपकरण स्थापित किए जाएं तो बारिश के आंकड़े अधिक सटीक मिलेंगे। इससे मौसम पूर्वानुमान की गुणवत्ता सुधरेगी, किसानों को समय पर सलाह मिल सकेगी और आपदा प्रबंधन के साथ-साथ जल संसाधनों की बेहतर योजना बनाना भी संभव होगा। वर्तमान परिस्थितियों में राजस्थान जैसे विशाल राज्य में मौसम निगरानी तंत्र को और मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
मौसम विभाग ने जयपुर में चार स्थानों पर एडब्ल्यूएस यंत्र लगा रखे है। वर्तमान में मौसम विज्ञान केंद्र सांगानेर, दुर्गापुरा स्थित रारी, अमेटी यूनिवरसिटी और दूदू में एडब्ल्यूएस यंत्र लगे हुए है। इसके अलावा सांगानेर, जेएलएन मार्ग सहित अन्य कुछ जगहों पर जलसंसाधन विभाग ने वर्षामापी यंत्र लगा रखे है। पिछले दिनों मौसम विभाग ने राजस्थान विश्वविद्यालय परिसर में भी एडब्ल्यूएस यंत्र लगाने की योजना बनाई थी लेकिन अनुमति नहीं मिलने के कारण उसे टाल दिया गया।
मौसम विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक हिमांशु का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर प्रदेश में मौसम यंत्र व्यवस्था बनाने को लेकर काम करते है। जलसंसाधन विभाग जहां यंत्र लगा देता है वहां पर मौसम विभाग मौसम उपकरण नहीं लगाता है। हालांकि मौसम विभाग जिला स्तर के साथ बड़े या ज्यादा वर्षा वाले स्थान पर ही मौसम यंत्र लगाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश

