पापड़ को पर्पट और पोहे को पृथुकम् बोल रहे बच्चे
भाषा बोधन वर्ग में संस्कार और संभाषण का अनूठा संगम
उदयपुर, 06 जून (हि.स.)। उदयपुर में चल रहे संस्कृत भारती के आवासीय संस्कृत भाषा बोधन वर्ग का चतुर्थ दिवस उत्साह, अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण रहा। योग, संस्कृत संभाषण, भाषा-क्रीड़ा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से विद्यार्थियों ने न केवल संस्कृत भाषा का अभ्यास किया, बल्कि भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों को भी आत्मसात किया।
शिविर के प्रशिक्षण का प्रभाव बच्चों के वार्तालाप में दिखाई देने लगा है। वे अब भोजन एवं दैनिक उपयोग के शब्द संस्कृत में बोल रहे हैं। जैसे पोहे को पृथुकम्, खीर को पायसम्, सेवइयां को सूत्रिका, बाटी को अङ्गारिका, आइसक्रीम को पयोहिमम्, जलेबी को कुण्डलिका, हलवे को संयावः, दलिये को यवागू:, पापड़ को पर्पटः, बिस्किट को सुपिष्टकम्, पनीर को आमिक्षा, दाल को सूपः, पानी पूरी को जलपूरिका से पुकारा जा रहा है। विद्यार्थी इन शब्दों का व्यवहार में प्रयोग कर संस्कृत को जीवनोपयोगी भाषा के रूप में सीख रहे हैं।
वर्ग संयोजक संजय शांडिल्य ने बताया कि यहां विद्या निकेतन बालिका विद्यालय हिरणमगरी सेक्टर 4 में चल रहे इस वर्ग का उद्देश्य संस्कृत को केवल एक विषय नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन की भाषा के रूप में स्थापित करना है। इसी क्रम में दिन का शुभारंभ एकात्मता स्तोत्र के सामूहिक गायन से हुआ। इसके पश्चात योग प्रशिक्षक कुलदीप जोशी एवं ईशा पालीवाल के निर्देशन में विद्यार्थियों ने योगाभ्यास कर शारीरिक सुदृढ़ता और मानसिक एकाग्रता का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
संभाषण एवं व्याकरण सत्रों में विद्यार्थियों को संस्कृत में दैनिक व्यवहार के वाक्यों का अभ्यास कराया गया। साथ ही चतुर्थी एवं पंचमी विभक्ति के प्रयोगों को सरल एवं व्यावहारिक रूप में समझाया गया। भोजन व्यवस्था भी पूर्णतः संस्कृत निर्देशों के मध्य सम्पन्न हुई, जिससे विद्यार्थियों को भाषा के व्यवहारिक स्वरूप का अनुभव प्राप्त हुआ।
सायंकालीन भाषा-क्रीड़ा सत्र विद्यार्थियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विभिन्न खेलों और रोचक गतिविधियों के माध्यम से संस्कृत शब्दावली एवं संभाषण का अभ्यास कराया गया। विभाग संयोजक दुष्यंत नागदा ने “संस्कृत संभाषण का महत्व” विषय पर उद्बोधन देते हुए कहा कि संस्कृत भारतीय ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति और जीवन-मूल्यों की आधारशिला है।
अंतिम सत्र में संस्कृत नाटक, श्लोक वाचन, गीत एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि संस्कृत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को दिशा देने वाली जीवंत भाषा है। संस्कृत भारती का यह प्रयास संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो रहा है।
वर्ग में शिक्षक प्रबंधक के रूप में श्रीयांश कंसारा, गौरव साहू, दिव्यांशु, मेहरान, विशाल शर्मा, लक्ष्मण, आंचल चौधरी, लारा उपाध्याय, ईशा पालीवाल, दिव्यांशी पालीवाल रहे। साथ ही वर्ग संयोजन में डॉ यज्ञ आमेटा, दुष्यंत नागदा, नरेंद्र शर्मा, सत्यप्रिय आर्य, डॉ भगवती शंकर व्यास, चैन शंकर दशोरा, डॉ रेनू पालीवाल, मीनाक्षी द्विवेदी, केशव नागदा, पहल सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने व्यवस्थाओं में सक्रिय योगदान दिया। “संस्कृतं वदामः, संस्कृतिं रक्षामः, राष्ट्रं समुन्नयामः।” — यही भावना पूरे वर्ग में प्रेरणा का स्रोत बनी रही।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता

