महात्माओं का काम चलते रहना और अपने उद्देश्य की पूर्ति करना : बाबा उमाकांत महाराज

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महात्माओं का काम चलते रहना और अपने उद्देश्य की पूर्ति करना : बाबा उमाकांत महाराज


जयपुर, 12 अगस्त (हि.स.)। परम संत बाबा उमाकांत महाराज ने सत्संग में कहा कि महात्माओं का काम निरंतर चलते रहना और जिस उद्देश्य के लिए वे धरती पर आए हैं, उसकी पूर्ति करना है। उन्होंने कहा कि संत सतगुरु हमेशा इस धरती पर रहते हैं और जब समाज में अत्याचार, पापाचार व दुराचार बढ़ता है तथा लोगों की दुख-तकलीफें बढ़ जाती हैं, तब वे लोगों को सही मार्ग बताते हैं।

बाबा उमाकांत महाराज ने कहा कि महात्माओं के एक स्थान पर रुक जाने से उनकी भूमिका सीमित हो सकती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह पानी रुक जाने पर गंदा हो जाता है, जबकि बहता हुआ पानी स्वच्छ बना रहता है, उसी प्रकार संतों को भी निरंतर चलते रहना चाहिए। इसी भाव को उन्होंने ‘रमता जोगी बहता पानी’ कहकर समझाया।

उन्होंने कहा कि संत लोगों को दुख और परेशानियों से निकलने का मार्ग बताते हैं। साथ ही जीवात्मा को मृत्यु लोक और अन्य लोकों के बंधनों से मुक्ति दिलाकर प्रभु तक पहुंचने का उपाय भी बताते हैं। उनके अनुसार संतों का उद्देश्य केवल सांसारिक समस्याओं का समाधान करना नहीं, बल्कि जीवात्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना भी है।

बाबा उमाकांत महाराज ने कहा कि मनुष्य को सांसारिक जीवन में तो मार्गदर्शन और सहयोग की आवश्यकता होती ही है, लेकिन शरीर छोड़ने के बाद जीवात्मा जब ऊपरी लोकों की ओर जाती है या साधना के माध्यम से आगे बढ़ती है, तब भी गुरु की आवश्यकता रहती है। उन्होंने कहा कि जिन लोकों से होकर जीवात्मा को प्रभु तक पहुंचना होता है, वहां भी बाधाएं आती हैं। ऐसे में गुरु ही मार्गदर्शन और सहायता करते हैं। चाहे संसार का कोई कार्य हो या भगवान के दर्शन और प्राप्ति का मार्ग, गुरु के बिना उसकी पूर्णता संभव नहीं है। इसलिए जीवन में गुरु का महत्व हर स्तर पर है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

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