भारत की आत्मा भारतीय साहित्यकारों में बसती है-ओम बिरला
कोटा, 30 मई (हि.स.)। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् राजस्थान का 9वां प्रदेश महाधिवेशन शनिवार को कोटा स्थित राजकीय आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा एकीकृत महाविद्यालय, तलवंडी में भव्य रूप से प्रारंभ हुआ। दो दिवसीय इस महाधिवेशन में राजस्थान के विभिन्न जिलों से पहुंचे सैकड़ों साहित्यकार, कवि, चिंतक और साहित्य प्रेमी भाग ले रहे हैं। पूरे आयोजन में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और साहित्यिक चेतना का अद्भुत संगम देखने को मिला।
महाधिवेशन के उद्घाटन सत्र का शुभारंभ पर सभागार देशभक्ति और साहित्यिक ऊर्जा से सराबोर रहा। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने संबोधन में भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा और साहित्यकारों की सामाजिक भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा उसके साहित्यकारों में बसती है और साहित्यकार समाज को दिशा देने वाला संवेदनशील प्रहरी होता है।
उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की स्थापना भारतबोध, राष्ट्रभक्ति और भारतीयता के मूल भाव को लेकर हुई थी, जो आज “आत्मबोध से विश्वबोध” की अवधारणा के माध्यम से वैश्विक मानवीयता के उच्च आदर्शों को स्थापित कर रही है।
बिरला ने कहा कि साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि समाज की चेतना, संस्कृति और राष्ट्रभावना का सशक्त माध्यम है। उन्होंने साहित्यकारों से भारतीय संस्कृति और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान भी किया।
उद्घाटन सत्र के विशिष्ट अतिथि डॉ. पवनपुत्र बादल ने भारतीय साहित्य की मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक गहराई पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत महान साहित्यकारों और विचारकों की भूमि रही है, जहां साहित्य ने सदैव समाज को नैतिक दिशा देने का कार्य किया है।
उन्होंने महाकवि कालिदास और गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके काव्य में मानवीयता, करुणा और लोकमंगल की विराट भावना निहित है, जो आज भी समाज को प्रेरित करती है।
उद्घाटन सत्र का संचालन अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के प्रदेश महामंत्री डॉ. केशव शर्मा ने किया।
दोपहर में आयोजित तृतीय सत्र में “लोक मंथन की जानकारी, बाल साहित्य, युवा कार्य और लोक साहित्य” विषयों पर गंभीर चर्चा हुई। इस सत्र में परिषद् के राष्ट्रीय मंत्री भरत ठाकौर, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. इंदु शेखर तत्पुरुष और प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अन्नाराम शर्मा ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि लोक साहित्य भारतीय समाज की सांस्कृतिक जड़ों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि बाल साहित्य नई पीढ़ी में संस्कार और रचनात्मक चेतना विकसित करने का माध्यम है। युवा साहित्यकारों को भारतीय मूल्यों से जोड़ते हुए साहित्यिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया।
इस सत्र का संचालन जयपुर प्रांत के अध्यक्ष डॉ. ओमप्रकाश भार्गव ने किया।
चतुर्थ सत्र में परिषद् की “आदर्श इकाई” और आगामी वार्षिक कैलेंडर पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान संगठनात्मक गतिविधियों, साहित्यिक आयोजनों और विभिन्न प्रांतों में होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। इस सत्र के मुख्य वक्ता भरत ठाकौर, डॉ. अन्नाराम शर्मा और डॉ. पवनपुत्र बादल रहे। सत्र के दौरान परिषद् से जुड़े साहित्यकारों की पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया, जिसने आयोजन को और अधिक साहित्यिक गरिमा प्रदान की।
पंचम सत्र “संभागश बैठक, दायित्व घोषणा और दायित्व बोध” विषय पर केंद्रित रहा। इसमें परिषद् की विभिन्न इकाइयों और पदाधिकारियों से संबंधित महत्वपूर्ण घोषणाएं की गईं।
संगठन को और अधिक सक्रिय एवं प्रभावी बनाने के लिए साहित्यकारों को नए दायित्व सौंपे गए।
महाधिवेशन के प्रथम दिवस का समापन संध्याकालीन काव्य संध्या के साथ हुआ। “संघ विषय पर केंद्रित काव्य” कार्यक्रम में प्रदेशभर से आए कवियों ने राष्ट्रभक्ति, भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना से ओतप्रोत कविताओं का पाठ किया। कवियों की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं में देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव का भाव जागृत कर दिया। काव्य संध्या का संचालन कवि योगीराज योगी ने किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित

