सिंधी समाज मनाएगा असूचंड महापर्व : ज्योति प्रज्ज्वलन और महाआरती के होंगे आयोजन

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सिंधी समाज मनाएगा असूचंड महापर्व : ज्योति प्रज्ज्वलन और महाआरती के होंगे आयोजन


जयपुर, 11 अक्टूबर (हि.स.)। गुलाबी नगरी में सिंधी समाज की ओर से सोमवार, 12 अक्टूबर को असूचंड महापर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर शहर के भगवान झूलेलाल मंदिरों और पावन तीर्थ अमरापुर स्थान में विशेष धार्मिक आयोजन होंगे। पर्व को एकता दिवस के रूप में भी मनाया जाएगा। मंदिरों में ज्योति प्रज्ज्वलन, पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ श्रद्धालु भगवान झूलेलाल की आराधना करेंगे।

तुलसी संगतानी ने बताया कि पर्व के अवसर पर सुबह भगवान झूलेलाल का पंचामृत अभिषेक कर विग्रह को नवीन वस्त्र धारण कराए जाएंगे। बहिराणा साहब की स्थापना के साथ ज्योति प्रज्ज्वलित की जाएगी और धर्म ध्वजा फहराई जाएगी। भगवान को पारंपरिक प्रसाद के रूप में मीठे चावल और छोले का भोग लगाया जाएगा। पल्लव प्रार्थना के माध्यम से विश्व मंगल, सुख-समृद्धि और शांति की कामना की जाएगी। महिलाएं अक्षत और चीनी लेकर अखो प्रार्थना करेंगी।

अमरापुर स्थान में सुबह-शाम होगी आरती

पावन तीर्थ अमरापुर स्थान में सुबह छह बजे भगवान झूलेलाल की ज्योति प्रज्ज्वलित कर पूजा-अर्चना की जाएगी। भजन और आरती के बाद मीठे चावल व छोले का भोग लगाकर प्रसाद वितरित किया जाएगा। शाम छह बजे भी ज्योति प्रज्ज्वलन, पूजा और आरती का आयोजन होगा। शहर के विभिन्न झूलेलाल मंदिरों में अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित की जाएगी और कई स्थानों पर मेले जैसा माहौल रहेगा।

भगत-पंजिड़े और छेज नृत्य की प्रस्तुतियां

असूचंड महापर्व पर सिंधी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं की झलक भी देखने को मिलेगी। मंदिरों में सिंधी संगीत की पारंपरिक विधाओं भगत और पंजिड़े की प्रस्तुतियां होंगी। श्रद्धालु छेज लोकनृत्य के माध्यम से भगवान झूलेलाल के प्रति अपनी आस्था प्रकट करेंगे। कई मंदिरों में बच्चों के मुंडन और जनेऊ संस्कार भी संपन्न होंगे। पर्व को लेकर मंदिरों को ऋतु पुष्पों और बिजली की झालरों से सजाया गया है।

एकता और सद्भाव का प्रतीक है पर्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, असूचंड पर्व जल और ज्योति की उपासना से जुड़ा है। सिंध प्रदेश में सिंधु नदी के तट पर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग जल एवं ज्योति की पूजा कर मीठे चावल का भोग लगाते थे। इसी परंपरा के कारण यह पर्व आपसी एकता, भाईचारे और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है।

असूचंड पर शुक्ल पक्ष की द्वितीया के चंद्र दर्शन का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन चंद्र दर्शन करने से मन के विकार दूर होते हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। सिंधी समाज के लिए यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने का अवसर भी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

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